नई दिल्ली: करीब दो साल की जांच के बाद भी केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) उन सभी पुलिसकर्मियों की पहचान नहीं कर पाई जिन्होंने 2020 की दिल्ली हिंसा के दौरान 23 साल के फैज़ान को पीट-पीटकर मार डाला था। हिंसा के दौरान सड़क किनारे घायल पड़े फैज़ान को पुलिसवालों ने जबरन राष्ट्रगान गाने को कहा था। उत्तर-पूर्वी दिल्ली के मौजपुर इलाके के पास फैज़ान और चार अन्य लोगों के साथ कुछ पुलिसकर्मियों द्वारा  बेरहमी से की गई मारपीट कैमरे में कैद हो गई थी। बाद में यह वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था।

मारपीट के बाद फैज़ान को एक दिन तक पुलिस हिरासत में रखा गया। बाद में उसे गंभीर रूप से घायल हालत में छोड़ा गया और अगले ही दिन उसकी मौत हो गई। 

शुरुआत में दिल्ली पुलिस ने मामले की जांच की। गौरतलब है कि दिल्ली पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करती है। अपनी जांच में दिल्ली पुलिस फैज़ान की पीट-पीटकर हत्या करने वाले एक भी पुलिसकर्मी की पहचान नहीं कर पाई थी। अदालत ने पुलिस को फटकार लगाते हुए यह मामला सीबीआई को सौंपा था, और उन पुलिसवालों की पहचान करने को कहा था जिनकी जिम्मेदारी दंगों को रोकने की थी, लेकिन उन्होंने एक नागरिक की बेरहमी से हत्या कर दी।

लेकिन सीबीआई भी ऐसा करने में असफल रही। उसने निचली रैंक के उन्हीं दो पुलिसवालों को आरोपी बनाया जिन पर दिल्ली पुलिस भी अपनी जांच में शक जता चुकी थी। यह दो पुलिसवाले थे हेड कांस्टेबल रविंदर कुमार और कांस्टेबल पवन यादव। हालांकि सीबीआई ने माना कि 'गंभीर रूप से पीटे जाने के कारण फैज़ान की मौत हुई', फिर भी उसने रविंदर कुमार और पवन यादव पर हत्या का मुकदमा दर्ज नहीं किया। इसके बजाय, उन पर (तत्कालीन भारतीय दंड सहिंता के तहत) गैर-इरादतन हत्या (धारा 304 (II)), एक समूह द्वारा हिंसक कृत्य करने (धारा 34) और गंभीर चोट पहुंचाने (धारा 323 और 325) के आरोप लगाए गए।

द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने सीबीआई द्वारा 5 फरवरी को दायर की गई अंतिम चार्जशीट रिपोर्ट देखी। रिपोर्ट बताती है कि कैसे सीबीआई ने पता लगाया कि दिल्ली पुलिस ने दोषी पुलिसकर्मियों की पहचान करने के बहुत कम प्रयास किए। पुलिस ने अदालत में यह तक कहा था कि उसके पास उस दिन घटनास्थल पर तैनात पुलिसवालों का ड्यूटी रोस्टर ही नहीं है। लेकिन सीबीआई ने उसी रोस्टर का इस्तेमाल कर दो आरोपियों की पहचान कर ली।

रिपोर्ट सीबीआई की जांच का तरीका भी दिखाती है, जो फैज़ान के अन्य हत्यारों को पहचानने में नाकाम रहा। वह शायद आज भी दिल्ली पुलिस में नौकरी कर रहे होंगे। चार्जशीट में भाजपा नेता और अब दिल्ली सरकार में मंत्री कपिल मिश्रा का भी जिक्र है, लेकिन उन्हें 'लोगों को हिंसा के लिए उकसाने' के मामले में क्लीन चिट दे दी गई है।

चार्जशीट बताती है कि सीबीआई ने भाजपा नेता कपिल मिश्रा को आरोपमुक्त कर दिया, जबकि एक पीड़ित ने उन पर दंगे भड़काने का आरोप लगाया था।

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दिल्ली पुलिस का ड्यूटी रोस्टर, जो उसके पास नहीं था

23 फरवरी 2020 की शाम को उत्तर-पूर्वी दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी। हिंसक भीड़ ने हत्या और आगजनी की घटनाओं को अंजाम दिया। निशाने पर वे मुस्लिम प्रदर्शनकारी थे जो नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के खिलाफ धरने पर बैठे थे। 

इससे कुछ घंटे पहले कपिल मिश्रा ने मौजपुर चौक पर प्रदर्शनकारियों को सड़क खाली करने के लिए तीन दिन का अल्टीमेटम दिया था। उनके बयान के वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुए थे। बाद में उसी जगह से थोड़ी दूरी पर फैज़ान को पीटा गया।  इस हिंसा में 50 से अधिक लोग मारे गए, जिनमें ज्यादातर मुसलमान थे।

अगले दिन हिंसा और बढ़ गई। उसी दोपहर फैज़ान अपने घर कर्दमपुरी से अपनी मां को खोजने निकला, जो पास के प्रदर्शन स्थल पर गई थीं। वह फिर कभी घर वापस नहीं लौटा। फैज़ान एक मीट की दुकान पर काम करता था। 

मृत्यु से पहले दिए बयान में फैज़ान ने बताया था कि कर्दमपुरी मोहल्ला क्लिनिक के पास पहुंचते ही पुलिसवालों ने उसका 'गला पकड़कर उसे मुख्य सड़क तक घसीटा'। उसने बताया कि 8 से 10 पुलिसकर्मियों ने उसे डंडों से पीटा, लातों से मारा और फिर बूटों से कुचला।

मरने से पहले फैज़ान का बयान, जो उसने अपनी मां किस्मतून को दिया था। उसने कहा था कि उसे मुस्लिम होने की वजह से निशाना बनाया गया।

इस हमले के जो वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे वह फैज़ान के बयान की पुष्टि करते हैं। वीडियो में कुछ पुलिसवाले दिखते हैं, जिनमें एक को छोड़कर सभी ने हेलमेट पहना है। वह पांच घायल लोगों को सड़क किनारे घसीटते हैं और बारी-बारी से उन्हें पीटते हैं। एक अन्य वीडियो में पुलिसवाले घायल पड़े फैज़ान और अन्य लोगों से जबरन राष्ट्रगान गाने को कहते हैं। वीडियो में पुलिसकर्मियों को उन्हें बेरहमी से पीटते देखा जा सकता है। वह "ये लो आज़ादी" कहते हुए उनका मजाक उड़ाते सुनाई देते हैं। फैज़ान ने अपनी मां से कहा था कि पुलिस ने उसे मुस्लिम होने के कारण अपमानित और प्रताड़ित किया।

3 मार्च 2020 को न्यूज़लॉन्ड्री द्वारा प्रकाशित एक और वीडियो में उक्त पांच घायलों के इर्द-गिर्द कम से कम नौ पुलिसकर्मी दिखते हैं। उनमें से कुछ उन्हें लातों और डंडे से मारते दिखाई देते हैं। हालांकि सीबीआई वीडियो में मौजूद सात पुलिसवालों की पहचान नहीं कर पाई।

फैज़ान ने मृत्यु से पहले दिए अपने बयान में जो कुछ कहा था उसकी पुष्टि एक अन्य वीडियो से भी होती है। वीडियो में फैज़ान मोहल्ला क्लिनिक के बाहर पड़ा दिखता है, तभी हेलमेट पहना एक पुलिसकर्मी उसके पास आकर लाठी से मारना शुरू कर देता है। उसके बाद एक-एक करके पांच और पुलिसकर्मी हेलमेट पहने आते हैं और बारी-बारी से फैज़ान के सिर पर लाठियां बरसाते हैं। 

फैज़ान ने कहा था कि उसने पुलिस से विनती की थी कि उसे छोड़ दिया जाए क्योंकि उसने कुछ नहीं किया, लेकिन उन्होंने उसकी बात नहीं सुनी।

दिल्ली पुलिस की विशेष जांच टीम (एसआईटी) ने चार साल से अधिक समय तक उन पुलिसवालों की पहचान करने का प्रयास किया, लेकिन उसने किसी भी पुलिसकर्मी पर हत्या का आरोप नहीं लगाया।   

दिल्ली हाईकोर्ट में दिए गए स्पष्टीकरण में एसआईटी ने कहा कि हिंसा इतनी बड़े पैमाने पर हुई थी कि दिल्ली के अलग-अलग इलाकों के पुलिस स्टेशनों और दूसरे संस्थानों से पुलिस की टुकड़ियों को बुलाया गया था। इसलिए यह ज़रूरी नहीं था कि उस दिन वहां तैनात पुलिसवाले स्थानीय पुलिस स्टेशन के ही हों।" उनकी दलील थी कि उनके पास उस दिन घटनास्थल पर तैनात पुलिसवालों की ड्यूटी लिस्ट नहीं है। हाईकोर्ट उनकी इस दलील से संतुष्ट नहीं हुई।

दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले से पता चलता है कि दिल्ली पुलिस ने ड्यूटी रोस्टर की मौजूदगी से इंकार किया था।

अदालत ने दिल्ली पुलिस की जांच को 'धीमी और आधी-अधूरी' बताया और कहा कि फैज़ान पर 'बेरहमी से हमला करने वाले संदिग्ध पुलिसवालों को बड़ी आसानी से बचाया जा रहा है'। 23 जुलाई 2024 को अदालत ने मामला सीबीआई को सौंप दिया।

सीबीआई के हाथ में मामला आने पर दिल्ली पुलिस का दावा झूठा निकला। ड्यूटी रोस्टर मौजूद था। उसी रोस्टर के आधार पर सीबीआई ने रविंदर कुमार और पवन यादव की पहचान की। दिल्ली पुलिस की एसआईटी ने भी जांच के दौरान संदिग्ध के रूप में इन्हीं दोनों की पहचान की थी। 

सीबीआई को पता चला कि उस दिन दिल्ली आर्म्ड पुलिस की 7वीं बटालियन की V&T कंपनी के पुलिसकर्मी उस इलाके में तैनात थे। जांच के दौरान सब-इंस्पेक्टर सुचेंद्र ने एक वीडियो में रविंदर कुमार की पहचान की। साथ ही यह भी पता चला कि उस दिन पवन यादव उसके साथ था।

सीबीआई की चार्जशीट बताती है कि उसने उसी ड्यूटी रोस्टर का इस्तेमाल कर दो आरोपियों की पहचान की, जिसके होने से दिल्ली पुलिस इंकार कर रही थी।

वॉइस एनालिसिस में दोनों की आवाज "ये लो आज़ादी" वाले वीडियो से मेल खाई। रविंदर कुमार का चेहरा भी फोरेंसिक जांच में वीडियो से मैच हुआ। लाइ डिटेक्टर टेस्ट  में भी दोनों के जवाब 'भ्रामक' पाए गए।

लेकिन सीबीआई उन्हीं पर रुक गई। एजेंसी ने कहा कि 'कई अन्य अधिकारियों से पूछताछ की गई', लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला।

द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने सीबीआई को सवाल भेजे और पूछा कि वीडियो में फैज़ान और चार अन्य घायलों के इर्द-गिर्द दिख रहे बाकी सात पुलिसकर्मियों की पहचान क्यों नहीं की गई, जिनका ज़िक्र सीबीआई ने चार्जशीट में भी किया है। लेकिन सीबीआई की ओर से कोई जवाब नहीं मिला है। यदि उनकी प्रतिक्रिया प्राप्त होती है तो इस स्टोरी में संशोधन कर दिया जाएगा।

किसने बंद किए सीसीटीवी कैमरे?

हमले के करीब तीन घंटे बाद, रात लगभग 8 बजे कुछ पुलिसवाले पांचों घायलों को एक पुलिस की गाड़ी में दिलशाद गार्डन-स्थित गुरु तेग बहादुर अस्पताल ले गए।

फैज़ान के पहले मेडिको-लीगल सर्टिफिकेट में सिर पर गहरे घाव, पैरों में सूजन और खरोंच के साथ कंधों पर भी चोट का जिक्र था। उसे न्यूरोसर्जरी और ऑर्थोपेडिक विभाग में भेजने की सलाह दी गई थी। जबकि हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि फैज़ान को न्यूरोसर्जन के पास नहीं ले जाया गया, सीबीआई ने चार्जशीट में दावा किया है कि शुरुआती उपचार के बाद उसे न्यूरोसर्जन और ऑर्थोपेडिक डॉक्टर दोनों ने देखा था।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि मेडिकल जांच में रेफर किए जाने के बावजूद फैज़ान को न्यूरोसर्जरी विभाग ले जाया गया।

फैज़ान ने अपने बयान में कहा था कि "डॉक्टरों ने उससे कोई बात नहीं की और पुलिस के निर्देश पर ही सारी मेडिकल जांच और इलाज किया गया।"

पुलिस स्टेशन के अंदर फैज़ान के साथ क्या हुआ, इसका सबूत वहां लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज हो सकती थी। लेकिन दिल्ली पुलिस की एसआईटी ने दावा किया कि उस रात 'पूरा सीसीटीवी सिस्टम खराब था'।

प्राथमिक इलाज के बाद फैज़ान और दो अन्य घायलों को उसी रात ज्योति नगर पुलिस स्टेशन लाया गया। सीबीआई की चार्जशीट में सब-इंस्पेक्टर दिनेश द्वारा पुलिस डायरी में दर्ज रिकॉर्ड का उल्लेख है, जिसमें कहा गया है कि वे तीनों अपनी मर्जी से वहां रुके और वह घर नहीं जाना चाहते थे क्योंकि बाहर स्थिति खराब थी।

सीबीआई ने पुलिस का बयान दर्ज किया है, जिसमें दावा किया गया है कि फैज़ान और दो अन्य पीड़ित अपनी मर्जी से उसी थाने में शरण लेने गए थे, जहां वही पुलिसकर्मी मौजूद थे जिन्होंने उन्हें थोड़ी देर पहले पीटा था।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस कहानी पर भरोसा करना कठिन है। अदालत ने पूछा कि अगर फैज़ान अपनी सुरक्षा के लिए थाने गया था, तो उसने अपने परिवार से संपर्क क्यों नहीं किया या फिर पुलिस को अपने निवास-स्थान के बारे में क्यों नहीं बताया। दिल्ली पुलिस की मानें तो फैज़ान ने अपनी सुरक्षा के लिए उन्हीं पुलिसवालों पर भरोसा किया जिन्होंने उसे थोड़ी देर पहले बेरहमी से पीटा था, जिसके कारण उसके सिर में गंभीर चोट आई।

लेकिन फैज़ान की मां किस्मतून का दावा कुछ और है। उन्होंने अपनी याचिका में कहा कि जब उन्हें पता चला कि फैज़ान थाने में है, तो वह उसी रात अपने दूसरे बेटे नदीम के साथ वहां पहुंचीं, लेकिन दो पुलिसवालों ने उन्हें अंदर नहीं जाने दिया।

वह अगली सुबह 8 बजे वापस आईं, लेकिन तब तक भी फैज़ान को नहीं छोड़ा गया था। उसे देर रात  छोड़ा गया, हमले के करीब 30 घंटे बाद। किस्मतून ने अपनी याचिका में कहा है कि वह 'वह बुरी तरह घायल अवस्था' में बाहर आया। उसके कपड़े 'खून से सने थे', पैंट 'फटी हुई थी' और वह ठीक से चल भी नहीं पा रहा था। अगली सुबह, 26 फरवरी को उसकी हालत बिगड़ने पर परिवार उसे लोक नायक अस्पताल ले गया, जहां उसी रात उसकी मौत हो गई।

गौरतलब है कि फैज़ान को पुलिस स्टेशन ले जाने से पहले हुई मेडिकल जांच में केवल तीन चोटें दर्ज थीं। जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में फैज़ान के शरीर पर चोटों की संख्या बढ़कर 20 हो गई थी। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में मौत का कारण 'सिर और शरीर पर लगी गंभीर चोटें' बताया गया। इन चोटों में कोहनी, घुटनों, उंगलियों और पेट के पीछे घाव तथा पूरे शरीर पर सूजन और चोट के निशान शामिल थे। रिपोर्ट में कहा गया कि सभी चोटें मौत से दो से तीन दिन पहले की थीं।

फैज़ान को हिरासत में यातना दिए जाने के आरोपों की जांच करने के लिए जब सीबीआई ने सीसीटीवी फुटेज खंगालनी चाही तो उसे पता चला कि कैमरे उस दिन काम ही नहीं कर रहे थे।

एजेंसी ने एक थर्ड-पार्टी इंजीनियर की रिपोर्ट की समीक्षा की, जो 10 दिन बाद सीसीटीवी सिस्टम ठीक करने के लिए स्टेशन गया था। रिपोर्ट के अनुसार, रिकॉर्डिंग यूनिट के 'पावर केबल कनेक्ट नहीं थे'।

दिल्ली पुलिस ने कहा था कि घटना वाले दिन सीसीटीवी सिस्टम खराब हो गया था, जबकि सीबीआई ने पाया कि सिस्टम का प्लग निकाला गया था, और माना कि ऐसा शायद 'जानबूझकर कैमरों को नुकसान पहुँचाने के लिए किया गया था'।

सीबीआई ने ज्योति नगर पुलिस स्टेशन के सिर्फ पांच पुलिसकर्मियों का फोरेंसिक परीक्षण किया। एसएचओ शैलेन्द्र तोमर, सब-इंस्पेक्टर दिनेश कुमार, सहायक सब-इंस्पेक्टर नरेश कुमार, हेड-कांस्टेबल अनिरुद्ध और कांस्टेबल राकेश कुमार से उनकी संलिप्तता के लिए पूछताछ की गई।

लेकिन सीसीटीवी से छेड़छाड़ और हिरासत में कथित यातना की जांच वहीं रुक गई। इसके साथ ही यह जांच भी रुक गई कि फैज़ान को पीटने वाले बाकी पुलिसकर्मी कौन थे।

यह मामला फिलहाल राउज एवेन्यू कोर्ट में चल रहा है, जो दिल्ली-स्थित एक जिला एवं सत्र न्यायालय है। पिछली सुनवाई 18 अप्रैल को हुई थी। इस सुनवाई में  फैज़ान पर हुए हमले को बेहद क्रूर और गंभीर बताते हुए किस्मतून ने दोनों आरोपी पुलिसवालों पर हत्या की धारा लगाने की मांग की। मामले की अगली सुनवाई 19 मई को होगी।