मुरैना & भोपाल: मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में लोहगढ़ पंचायत की ओर जैसे ही पश्चिमी हवा चलती है, इलाके में तेज़ दुर्गंध फैल जाती है। दिन भर की मेहनत के बाद गांव वाले जब अपने घर के आंगन में सोते हैं, उनके शरीर पर काले धूल की एक परत जम जाती है। लोहगढ़ और उससे सटे 13 अन्य गांवों की भी यही कहानी है।

पश्चिमी हवा के साथ जहरीली गैसों का एक खतरनाक मिश्रण आता है—कैंसर पैदा करने वाली गैसें, पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (PAHs), डायॉक्सिन, फ्यूरान और नाइट्रोजन के ऑक्साइड। ये हवा मुरैना जिला मुख्यालाय से नौ किलोमीटर दक्षिण में स्थित जादरुआ इंडस्ट्रियल एरिया से आती हैं, जो आगरा-मुंबई नेशनल हाईवे से सटा हुआ है।

इस इंडस्ट्रियल एरिया में 13 टायर पायरोलिसिस ऑयल (TPO) रिसाइक्लिंग प्लांट हैं। करीब दस साल पहले शुरू हुए इन प्लांट्स में पुराने टायरों को जलाकर पायरोलिसिस ऑयल, स्टील और कार्बन ब्लैक निकाला जाता है। इन्हें बेच कर प्लांट मालिक मुनाफा कमाते हैं।

फैक्ट्री से निकलने वाले काले धुएं की वजह से छत-बरामदों से लेकर फसल और पेड़-पौधों पर काले कालिख की एक परत बन जाती है।

सिर्फ हवा ही नहीं, ईन फैक्ट्रियों से निकलने वाले जहरीले पानी भी खेतों में बहा दिए जाते हैं। आसपास की नदियां भी अब विषाक्त नालों में तब्दील हो गईं हैं। 

कागजों पर तो भारत सरकार ने साल 2022 में पाइरोलिसिस ऑयल निकालने के लिए स्क्रैप टायरों के आयात पर बैन लगा दिया था। लेकिन इस बैन को सख्ती से लागू करने के लिए कोई निगरानी तंत्र नहीं है। दरअसल, देश में वेस्ट टायरों का आयात लगातार बढ़ रहा है, और मुरैना जैसे शहरों के पाइरोलिसिस प्लांट में आयातित वेस्ट टायरों को जलाया जाता है। जबकि इन्हें सिर्फ़ भारत की ही टायर जलाने की अनुमती है। 

मुरैना स्थित श्री राम कॉलेज ऑफ फार्मेस के प्रोफेसर योगेंद्र मवाई, कहते हैं, “पिछले दस साल से यहां के लोग कैंसर सांस के साथ ले रहे हैं।” मवाई इन फैक्टरियों के उत्सर्जन से पर्यावरण और लोगों पर पड़ने वाले स्वास्थ्य प्रभावों पर रिसर्च कर रहे हैं। वे कहते हैं कि ये फैक्टरियां घरेलू और आयातित टायरों को तय सीमा से कई गुना अधिक मात्रा में जलाती हैं।

दिल्ली के एनर्जी और एनवायरनमेंट एक्सपर्ट सागर धारा कहते हैं, “फैक्ट्रियों से निकले वाले विषाक्त गैस लंग्स, स्किन और ब्लैडर के कैंसर का खतरा बढ़ाती हैं। टायर के अवशेषों से निकलने वाले हेवी मेटल्स—जिंक, लेड, कैडमियम—शरीर में जमा हो सकते हैं, जिससे न्यूरोटॉक्सिसिटी, किडनी को नुकसान और बच्चों में विकास संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। ये फैक्टरियां दो तरह के लोगों को प्रभावित करती हैं। पहले वो लोग हैं जो फैक्टरी के अंदर काम करते हैं, और दूसरे वो जो आसपास रहते हैं।”

मध्य प्रदेश में ऐसे कुल 69 पाइरोलिसिस प्लांट हैं, और इनमें से 20 प्लांट मुरैना जिले में ही मौजूद हैं। इनमें से 13 प्लांट अकेले लोहगढ़ पंचायत में हैं।

रिपोर्टर्स कलेक्टिव की जांच में सामने आया कि देश भर में आयातित रबर टायरों का अवैध व्यापार फल-फूल रहा है। दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले भारत, जो खुद को ‘विकसित देश’ बनाने की महत्वाकांक्षा रखता है, आज विश्व में वेस्ट टायर का सबसे बड़ा डंपयार्ड बन चुका है।

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कैसे कैंसर आयात कर रहा है भारत

जुलाई 2022 में, भारत सरकार ने पायरोलिसिस प्लांट्स के लिए वेस्ट टायरों के आयात पर बैन लगा दी थी।

लेकिन सरकार अवैध रूप से आयात होने वाले वेस्ट टायरों की ट्रैकिंग के लिए अब तक कोई ठोस व्यवस्था नहीं बना सकी। नतीजतन यह कारोबार रुकने के बजाय कई गुना बढ़ता चला गया।

वेस्ट टायरों को अक्सर रबर स्क्रैप के टैग के तहत आयात किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार की भाषा में इसे HS कोड—Harmonised System Code—कहा जाता है। दुनिया भर में कस्टम अधिकारी इसी HS कोड के आधार पर यह पहचान करते हैं कि किसी शिपमेंट में वास्तव में क्या माल आयात किया जा रहा है।

स्क्रैप्ड टायरों के लिए कोई खास HS कोड नहीं होता। इन्हें ब्रॉड कैटेगरी में स्क्रैप रबर के तहत ही ट्रेड किया जाता है। शिपिंग डॉक्यूमेंट्स पर सिर्फ HS कोड देखने से पता नहीं चलता कि असल में क्या आ रहा है। कस्टम अधिकारियों को खुद जाँच पड़ताल कर इसका पता लगाना पड़ता है।

मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में लोहगढ़ के एक TPO प्लांट में बहुत सारे पुराने टायर के ढेर लगे हुए हैं। फोटो क्रेडिट: काशिफ काकवी

स्क्रैप टायर आयात पर लगे प्रतिबंध से बचने का एक और रास्ता है।

कचरे के टायरों का आयात सिर्फ एडवांस्ड बैच ऑटोमेटेड प्रोसेस (ABAP) प्लांट्स में प्रोसेस करने के लिए बैन किया गया है, जिन्हें TPO प्लांट्स भी कहते हैं (जैसे लोहगढ़ वाले प्लांट्स)। ये प्लांट पूरे टायरों को टायर पायरोलिसिस ऑयल, कार्बन ब्लैक और स्टील वायर में रिसाइकल करते हैं। इसके अलावा टायरों को रिसाइकिल करने के चार और तरीके हैं जिन्हें विदेशी टायर आयात करने की छूट है। 

सरकार अबतक कोई ऐसा सिस्टम नहीं बना सकी है जिससे पता चल सके की पोर्ट से आयात होने वाले टायरों को चेक किया जाए कि वो संबंधित फैक्ट्रियों में जा रहे हैं या अवैध रूप से TPO प्लांट्स में भेजे जा रहे है।

कागज पर यह टायर रिसाइक्लिंग प्लांट में प्रोसेस करने के लिए भेजे जाते हैं लेकिन वे मुरैना जैसे TPO प्लांट्स में पहुंचते हैं जिनके पास सिर्फ भारतीय टायरों को जलाने की अनुमति है।

वित्त वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच वेस्ट रबर का आयात देश में 2.64 लाख मीट्रिक टन से बढ़कर 13.72 लाख मीट्रिक टन हो गया है।

टायर एंड रबर रिसाइक्लर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (TRRAI) के प्रेसिडेंट सतीश गोयल ने बताया कि भारत में आयात बढ़ने की मुख्य वज़ह सरकार द्वारा साल 2022 में लाई गई EPR पॉलिसी है। इस पॉलिसी के कारण वेस्ट टायर रीसाइक्लिंग इंडस्ट्री को बल, पैसा और नीतिगत सहयोग मिला।

द रिपोर्टर्स कलेक्टिव से बात करते हुए उन्होंने कहा, “वेस्ट टायरों की डिमांड बहुत तेजी से बढ़ी है, और टायर निर्माताओं से आने वाले पैसे ने इंडस्ट्री की कैपेसिटी और टेक्नोलॉजी को अपग्रेड करने में काफी मदद की है।”

गोयल की बात से अंदाजा लगता है कि वेस्ट टायर इंडस्ट्री को रेग्यूलेट करने के लिए लाई गई पॉलिसी की वजह से ही भारत में वेस्ट टायरों का निर्यात बढ़ा।

यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका जैसे विकसित देशों से लेकर कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब जैसे गल्फ देश – जो खुद वेस्ट टायरों की समस्या से जूझ रहे थे – भारत में सबसे ज़्यादा वेस्ट टायर निर्यात कर रहे हैं।

यूके स्थित एक एनजीओ ने बीबीसी के साथ मिलकर साल 2023 और 2024 में भारत में यूके से आने वाले ख़राब टायरों को ट्रैक किया। इन दोनों रिपोर्ट्स में पता चला कि ये स्क्रैप टायर भारत आने के बाद लोहगढ़ और वाडा जैसे अवैध टीपीओ प्लांट्स में भेजा गया।

भारतीय कानून के मुताबिक, पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) और व्यापार एवं वाणिज्य मंत्रालय से लाइसेंस लेकर ट्रेडर्स वेस्ट टायरों का आयात सिर्फ रिसाइक्लिंग के लिए ही कर सकते हैं। लेकिन हमने कई बार कन्फर्म किया है कि विदेशी टायर भारत में सिर्फ रिसाइक्ल नहीं हो रहे, बल्कि बड़े पैमाने पर जलाए भी जा रहे हैं।

मध्य प्रदेश में पर्यावरण उल्लंघनों पर नजर रखने वाले एक्टिविस्ट शुभाष सी पांडेय कहते हैं, “हम प्रदूषण आयात करने के लिए पश्चिमी और खाड़ी देशों को करोड़ों रुपए देकर उनका कचरा अपने देश लाते हैं। यहां हमारे लोगों के दम घुट रहे हैं, हमारी जमीन मरुभूमि में तब्दील हो रही है, और पानी भी काला पड़ रहा है।”

द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने दस्तावेजों और सूत्रों के जरिए इस ट्रेड को ट्रेस किया। हमने पोर्ट्स से लेकर पायरोलिसिस प्लांट्स तक की तफ्तीश की।

पंजाब के संगरूर में आयातित टायरों की गठरियों से लदा एक ट्रक।

पोर्ट से प्लांट तक

विदेशों से पुराने टायर ‘बेल्स’ के फॉर्म में भारत निर्यात किए जाते हैं। ये भारत में तीन मुख्य समुद्री रास्तों—गुजरात, मुंबई और चेन्नई से आते हैं।

भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, देश में आयात होने वाले 70% से ज्यादा वेस्ट टायर (जिन्हें वेस्ट रबर के नाम से लाया जाता है) इन्हीं बड़े पोर्ट्स के रास्ते आते हैं।

डॉक पर ये रोज़ आते हैं और उन्हें गोडाउन में रखा जाता है जबकि कागज़ों पर ये रिसाइक्लिंग के लिए लाए गए होते हैं। इन्हें मूलतः दो कैटेगरी में बाँटा जाता है।

पहली कैटेगरी—जो टायर थोड़े अच्छी हालत में होते हैं—उन्हें सेकंड-हैंड टायर कारोबारियों को बेच दिया जाता है, ताकि वो फिर से फिट होकर गाड़ियों में लग जाएँ। ये टायर जल्दी ही भारतीय सड़कों पर वापस नज़र आने लगते हैं।

दूसरी कैटेगरी—जो खराब और बेकार टायर होते हैं इन्हें मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में बने अवैध या हल्के-फुल्के रेगुलेटेड पायरोलिसिस प्लांट्स को बेच दिया जाता है।

आयातित वेस्ट टायरों के डील अक्सर सोशल मीडिया चैनलों के ज़रिए हो जाते हैं।

द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने कई फैक्टरियों का दौरा किया, इस व्यवसाय से जुड़े लोगों से बात की जिनमें सेकंड-हैंड टायर डीलर, रिसाइक्लर, प्लांट ओनर, ट्रांसपोर्टर, ट्रक ड्राइवर और एक्सपर्ट्स शामिल हैं।

मध्य प्रदेश के इंदौर के एक टायर ट्रेडर ने इस नेटवर्क को समझाते हुए बताया कि, “जब बेल्स पोर्ट पर पहुँचती हैं, तो हमें फोटो के साथ जानकारी मिल जाती है। हम अपनी ज़रूरत के हिसाब से टायर खरीदते हैं। इम्पोर्टर तो कभी-कभी नीलामी भी करवाता है ताकि ज़्यादा दाम मिल जाएँ। करीब 30% टायर ऐसे होते हैं जिन्हें गाड़ियों में फिट किया जा सकता है। इनसे अच्छा मुनाफा होता है।

उसने आगे कहा, आगे कहा,“बाकी के 70% में से हम उन टायरों को अलग करते हैं जो रिमोल्डिंग के लायक होते हैं और वर्कशॉप में ठीक करके सेकंड-हैंड के तौर पर बेचे जा सकते हैं। इसके बाद जो बच जाता है, वो सीधा पायरोलिसिस प्लांट्स में चला जाता है।”

मुरैना के एक खरीददार ने कहा कि ये डील WhatsApp ग्रुप्स, Telegram चैनल्स के ज़रिए गुपचुप तरीके से किए जाते हैं। उन्होंने बताया कि वे पैसों का लेनदेन नकद में ही करते हैं।

स्थानीय नेटवर्क की सहायता से रात के अंधेरे में टायर चुपचाप ट्रकों में लोड किए जाते हैं और वह गायब हो जाते हैं। इनका ठिकाना: पायरोलिसिस यूनिट्स और सड़क किनारे के वोर्कशॉप्स, जैसा कि मध्य प्रदेश के लोहगढ़ में चलते हैं। लेकिन ये प्लांट्स सिर्फ़ भारतीय टायरों को ही जलाने की इजाज़त रखते हैं।

द कलेक्टिव ने पाया कि इंदौर और भोपाल के ट्रेडर्स ने नेशनल हाईवे के किनारे गोदाम बना रखे हैं। आयातित टायर लाने वाले बड़े ट्रकों को बिना किसी को भनक लगे इन गोदाम में खाली किया जाता है। बाद में, इन टायरों को छोटे-छोटे लोडिंग वाहनों में ट्रांसफर कर दिया जाता है—या तो रीमोल्डिंग के लिए, शेडिंग के लिए, या सीधे पायरोलिसिस प्लांट, कभी-कभी तो वापस गुजरात तक भेजा जाता है।

यहाँ से ट्रेल को फॉलो करना मुश्किल हो जाता है। जबकि आधिकारिक कागज़ पर पूरी अलग कहानी बयां की जाती है।

UK-बेस्ड NGO की जांच के मुताबिक, टायर सर्टिफाइड रिसाइक्लिंग फैसिलिटीज़ में भेजे जा रहे हैं। सब कुछ कानूनी लगता है। लेकिन हकीकत में, टायर बहुत कम ही इन अधिकृत प्लांट्स तक पहुँचते हैं।

“हेज़र्डस वेस्ट रूल्स 2016 के तहत, पायरोलिसिस यूनिट्स को अब स्क्रैप टायर इंपोर्ट करने की इजाज़त नहीं है,” स्टेट पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के एक सीनियर अधिकारी ने कहा। “फिर भी, हाल की फील्ड विज़िट्स में हमने कुछ प्लांट्स पर आयातित वेस्ट टायर पाए, जिन्हें या तो कंप्लायंस नोटिस दिए गए या बंद करने के आदेश दिए गए।”

आयातित टायरों को पहचानने के संकेत बहुत आसान हैं। उन्होंने समझाया, “आयातित टायर अलग तरह से बंधे होते हैं, खास तरीके से कटे होते हैं, और उन पर Goodyear, Apollo, Bridgestone, Dunlop जैसी विदेशी ब्रांड की पहचान वाले नाम होती हैं।”

मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पूर्व निदेशक विजय अहिरवार बताते हैं कि राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को अधिकार है कि अगर कोई फैक्ट्री लापरवाही बरतती है या निरीक्षण में SoP का पालन नहीं करती, तो वॉटर एक्ट 1974 और एयर (प्रिवेंशन एंड कंट्रोल ऑफ पॉल्यूशन) एक्ट, 1981 के तहत उस फैक्ट्री को बंद करने का नोटिस जारी कर सकता है।

उनके मुताबिक, मजबूत वित्तीय और राजनीतिक संरक्षण के बिना पाइरोलिसिस प्लांट्स का संचालन लगभग नामुमकिन है। हालांकि, कई फैक्ट्रियां नियमों का उल्लंघन करने के कारण बंद कर दी गईं, जबकि उनके पास मसल पावर और राजनीतिक संरक्षण मौजूद था।

द कलेक्टिव ने अशोक बर्नवाल, पर्यावरण विभाग के एडिशनल चीफ सेक्रेटरी और एनवायरनमेंटल प्लानिंग एंड को-ऑर्डिनेशन ऑर्गनाइजेशन (EPCO), मध्य प्रदेश के डायरेक्टर जनरल से संपर्क किया, और राज्य भर में चल रहे अनरेगुलेटेड TPO प्लांट्स के कामकाज पर सवाल उठाया।

उन्होंने कहा, “विभाग और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड हर शिकायत पर कार्रवाई करता है और कंप्लायंस सुनिश्चित करता है।” उन्होंने ये भी कहा कि हाल ही में आधा दर्जन फैक्ट्रियां बंद की गईं क्योंकि वे कंप्लायंस नहीं कर रही थीं, इनमें से तीन मुरैना की थीं। कंप्लायंस करने के बाद ही उन्हें फिर से चलने की इजाजत मिली।

पर्दे के पीछे ये करोड़ों का बिजनेस है। सतह पर सब साफ-सुथरा दिखता है—कागजात ठीक, फॉर्म भरे हुए, नियमों का पालन होता हुआ लगता है। लेकिन ठीक नीचे काला कारोबार छिपा है—रबर जलाना, भ्रष्ट सिस्टम, और एक दम घुटने वाली सच्चाई।

भारत की पुरानी टायरों की समस्या

साल 2024–25 में भारत का कुल घरेलू टायर उत्पादन 42 लाख मीट्रिक टन रहा। इसमें से करीब 25 लाख मीट्रिक टन घरेलू बाजार में खपत हुआ, जबकि लगभग 2 लाख मीट्रिक टन इनर ट्यूब और फ्लैप्स का उत्पादन हुआ। शेष करीब 15 लाख मीट्रिक टन टायरों का निर्यात किया गया।

ऑटोमोटिव टायर मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ATMA) के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर राहुल वाचस्पति ने बताया कि भारत खुद हर साल करीब 25 लाख मीट्रिक टन पुराने टायर (end of life tyres) पैदा करता है।

उन्होंने बताया कि “भारत अपने खुद के टायर कचरे से जूझ रहा है, लेकिन पिछले साल देश ने 18 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा पुराने टायर आयात किए—मुख्य रूप से यूके, अमेरिका, जर्मनी, इटली, यूएई और ऑस्ट्रेलिया से। इन्हें ठीक-ठाक सुविधाओं में रीसाइकल नहीं किया जाता—ये सीधे उन TPO रीसाइक्लिंग प्लांट्स में चले जाते हैं, जो लोहगढ़ जैसी क्राइसिस पैदा कर रहे हैं।”

ATMA टायर मैन्युफैक्चर की सबसे बड़ी संस्थान है। इसने चेतावनी दी है कि भारतीय बाजार में पुराने टायरों की संख्या देश की सालाना रीसाइक्लिंग क्षमता से कहीं ज्यादा है। 

मार्च 2025 में वाणिज्य मंत्रालय को लिखे एक पत्र में ATMA ने कहा कि ये आयात “भारत की नाजुक रीसाइक्लिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पर बहुत ज्यादा बोझ डाल रहे हैं” और प्रदूषण के स्तर को बढ़ा रहे हैं। एसोसिएशन ने सरकार से पुराने टायरों के आयात पर बैन लगाने की मांग की।

ATMA का केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय को लिखा पत्र।

साल 2024 में, भारत ने कुल 30 लाख मीट्रिक टन पुराने टायरों को रिसाइकल किया। इसमें से 16 लाख मीट्रिक टन टायर देश के अंदर ही जेनरेट हुए थे, जबकि 14 लाख मीट्रिक टन इंपोर्ट किए गए थे।

अभी भारत की पुराने टायरों को रिसाइकल करने की कुल क्षमता 28.76 लाख मीट्रिक टन है। वाचस्पति ने इस बात पर ध्यान दिलाया कि “2024-25 में घरेलू और इंपोर्टेड टायरों को मिलाकर रिसाइक्लिंग के लिए कुल 43 लाख मीट्रिक टन पुराने टायर स्टॉक में थे – जो देश की क्षमता से काफी ज्यादा है।”

नीति आयोग की 2026 की रिपोर्ट ‘Waste Tyre Economy in India’ के मुताबिक, देश में अनुमानित 851 रिसाइक्लर्स हैं, लेकिन सिर्फ 552 को ही अधिकृत (अथॉराइज्ड) मंजूरी मिली हुई है। बाकी 299 अनधिकृत रिसाइक्लर्स ऐसे हैं जो 9 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा पुराने टायरों को जला रहे हैं (इंसिनरेट कर रहे हैं)।

रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि “…लगभग 300 अनधिकृत रिसाइक्लर्स हैं, और इनकी कुल अनधिकृत क्षमता करीब 9 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच जाती है। इससे पता चलता है कि रिसाइक्लिंग का एक बड़ा हिस्सा पूरी तरह रेगुलेटरी निगरानी के बाहर चल रहा है। अनौपचारिक प्लेयर्स अक्सर सस्ते, गैर-अनुपालित बैच पायरोलिसिस यूनिट्स पर निर्भर रहते हैं, जिनमें पर्यावरण की सही सुरक्षा के इंतजाम नहीं होते।”

इंपोर्ट में बढ़ोतरी की आशंका पहले ही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने सितंबर 2019 के अपने आदेश में जताई थी। NGT ने पुराने टायरों के इंपोर्ट पर रोक लगाने की बात कही थी, ताकि भारत दूसरे देशों से आने वाले अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले खतरनाक कचरे का डंप यार्ड न बन जाए और साथ ही इस प्रोसेस में लगे वर्कर्स की सेहत भी सुरक्षित रहे।

NGT की आशंका सच साबित हुई। साल 2022 में भारत ने पायरोलिसिस के लिए वेस्ट न्यूमेटिक टायर्स के इंपोर्ट पर पूरी तरह बैन लगा दिया। अब लोहगढ़ जैसी फैक्टरियां सिर्फ भारतीय टायरों को ही प्रोसेस कर सकती थीं।

लेकिन मार्च 2025 में, ब्रिटेन की एक जांच में इसका उल्लंघन उजागर हुआ। रिपोर्ट में बताया गया कि जीपीएस से ट्रैक की गई वेस्ट टायर्स की एक खेप यूके से निकली थी, जो कथित तौर पर भारत की दूसरी सबसे बड़ी टायर इंपोर्टर कंपनी Nine Corporation के लिए रिसाइक्लिंग के लिए जा रही थी। टायर्स आठ हफ्तों के बाद गुजरात के मुंद्रा पोर्ट पर पहुंचे। लेकिन ये कभी भी कंपनी के गुजरात प्लांट तक नहीं पहुंचे। जांच एजेंसी ने ट्रैक किया कि ये वेस्ट टायर्स लोहगढ़ और भारत भर के ऐसे ही दूसरे अन्य प्लांट्स में जा रहे हैं।

भोपाल के एक वर्कशॉप में एक वर्कर टायर्स और ट्यूब्स को काट रहा है। फोटो क्रेडिट: काशिफ काकवी

यूके की इस जांच में पाया गया कि यूके के टायर्स इन भारतीय पायरोलिसिस प्लांट्स में पहुंच रहे हैं, जबकि आधिकारिक कागजातों में साफ लिखा होता है कि इन्हें वैध तरीके से संचालित भारतीय रिसाइक्लिंग सेंटर्स भेजा जा रहा है। उन्होंने पाया कि दुनिया भर से, खासकर यूके से आने वाले करीब 70% टायर्स ऐसे अनाधिकृत इंडस्ट्रियल प्लांट्स में ही भेजे जा रहे हैं, जहां इन्हें जला दिया जाता है।

यूके की रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ कि 2023 में भेजी गई एक पहले की खेप के दो टायर बेल्स हरियाणा पहुंचे थे। इस छोटे से राज्य में 112 टीपीओ प्लांट्स हैं।

सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल दिल्ली को जमा की गई जनवरी 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, देश भर में 22 राज्यों में कुल 736 पायरोलिसिस फैक्टरियां चल रही हैं। इनमें सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में 161 टीपीओ प्लांट्स हैं, उसके बाद हरियाणा में 112 और महाराष्ट्र में 103 प्लांट्स हैं।

जबकि दिल्ली के एनवायरनमेंटल लॉयर संजय उपाध्याय दावा करते है कि, “भारत में कम से कम 1,500 पायरोलिसिस प्लांट्स चल रहे हैं।”

उपाध्याय की ही एनजीटी कोर्ट में 2019 में दाखिल की गई याचिका के बाद NGT ने सीपीसीबी को इन फैक्ट्री मालिकों पर लगाम कसने के लिए मजबूर किया था। “मॉनिटरिंग करने वाली अथॉरिटीज अक्सर असली संख्या छुपाती हैं, क्योंकि ज्यादातर प्लांट्स छिपकर चलते हैं, और उन्हें स्थानीय अधिकारियों और नेताओं का संरक्षण मिलता है।”

क्यों बढ़ रहा है इम्पोर्ट में उछाल—EPR क्रेडिट्स की वजह से?

इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत में वेस्ट टायर का संकट तेज़ी से बढ़ रहा है, और इसके पीछे वो पॉलिसी है जो वेस्ट टायर रिसाइक्लिंग को रेगुलेट और मैनेज करने के लिए लाई गई थी—ताकि सेहत और पर्यावरण की सुरक्षा हो सके।

जब भारत ने पायरोलिसिस के लिए वेस्ट टायर का इम्पोर्ट बैन कर दिया, ठीक उसी समय 2022 में वेस्ट टायर को एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर्स रिस्पॉन्सिबिलिटी (EPR) फ्रेमवर्क के अंदर लाया गया। इससे टायर बनाने वाली कंपनियों पर ये ज़िम्मेदारी आ गई कि वो अपने एंड-ऑफ-लाइफ टायर को 2024-25 तक 100% वैज्ञानिक तरीके से डिस्पोज़ करें। EPR ने वेस्ट टायर मैनेजमेंट की ज़िम्मेदारी सरकार से हटाकर प्रोड्यूसर्स पर डाल दी।

“जब EPR लागू हुआ था, तब ज्यादातर प्रोड्यूसर्स के पास खुद का रिसाइक्लिंग इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं था। इसलिए बहुत सारी कंपनियों ने सरकार से अधिकृत रिसाइक्लर्स को अपने साथ जोड़ा ताकि अपनी EPR ज़िम्मेदारी पूरी कर सकें,” सतीश गोयल, टायर एंड रबर रिसाइक्लर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (TRRAI) के प्रेसिडेंट ने कही।

पॉलिसी के मुताबिक, रिसाइक्लर्स वेस्ट टायर को डिस्पोज़ करते हैं और उसे सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की वेबसाइट पर अपलोड करते हैं। बोर्ड उसकी रिव्यू करके EPR क्रेडिट सर्टिफिकेट जारी करता है। इन क्रेडिट्स को प्रोड्यूसर्स खरीद सकते हैं। “रिसाइक्लर्स प्रोड्यूसर्स की तरफ से EPR क्रेडिट्स जेनरेट करते हैं और उन्हें प्रोड्यूसर्स को बेच देते हैं, ताकि प्रोड्यूसर्स एंड-ऑफ-लाइफ टायर की EPR कम्प्लायंस पूरी कर सकें।”

लेकिन भारत में कई रेगुलेशन्स की तरह ही, यहाँ भी पॉल्यूशन वॉचडॉग एजेंसियों की मॉनिटरिंग और कम्प्लायंस की कमी एक बड़ा लूपहोल बन गई है।

दिल्ली के वकील सौमित्र जैसवाल, जो एनजीटी में टीपीओ प्लांट्स को रेगुलेट करने के लिए याचिकाएं दायर की है ने बताया, “ईपीआर व्यवस्था से पहले, रिसाइक्लर्स सिर्फ़ अंतिम उत्पादों जैसे ऑयल, चार और स्टील से ही कमाई करते थे। लेकिन ईपीआर लागू होने के बाद, कई अधिकृत रिसाइक्लर्स ने बड़े पैमाने पर वेस्ट टायर्स आयात करना शुरू कर दिया और उन्हें टीपीओ प्लांट्स में भेजा जा रहा है क्योंकि पोर्ट से लेकर प्रोसेसिंग फैसिलिटी तक की मॉनिटरिंग बहुत कमज़ोर है।”

उन्होंने आगे कहा, “क्योंकि ईपीआर क्रेडिट्स टायर्स की मात्रा के आधार पर दिए जाते हैं, न कि पर्यावरणीय परफॉर्मेंस के आधार पर, इसलिए आयातित टायर्स को घटिया फैसिलिटी में जलाना बहुत ज़्यादा मुनाफ़े वाला काम बन गया है। इसी वजह से ईपीआर क्रेडिट्स शुरू होने के बाद स्क्रैप रबर के आयात में पाँच गुना बढ़ोतरी हो गई है।”

इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स और यूके की एनजीओ की रिपोर्ट के मुताबिक, आयातक या ट्रेडर्स पॉलिसी में मौजूद खामियों का फायदा उठा रहे हैं और मॉनिटरिंग मैकेनिज़्म के न होने की वजह से आयातित टायर्स को टीपीओ प्लांट्स में डायवर्ट कर रहे हैं, ताकि ईपीआर क्रेडिट्स जेनरेट कर सकें।

पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, अभी कुल 736 टीपीओ रिसाइक्लिंग प्लांट्स में से सिर्फ़ 296 ही उसके पोर्टल पर रजिस्टर्ड हैं।

भोपाल के टायर ट्रेडर गुड्डू खान ने बताया कि आयातित वेस्ट टायर सिर्फ 2 से 5 रुपये प्रति किलो में मिल जाते हैं, जबकि ग्वालियर-चंबल इलाके में देसी टायर 20 से 25 रुपये प्रति किलो के आसपास चलते हैं। आयातित टायर कहीं ज्यादा आसानी से मिल जाते हैं, क्योंकि भारत में वेस्ट टायर इकट्ठा करने के कोई सही सेंटर नहीं हैं। ऊपर से, आयातित टायर जलाने से ज्यादा मुनाफा होता है जितना देसी टायर से नहीं होता।

मध्य प्रदेश के पर्यावरणविद और वेस्ट मैनेजमेंट एक्सपर्ट इम्तियाज अली कहते हैं, “ये लोग आयातित टायर जलाकर EPR क्रेडिट बना लेते हैं, लेकिन दिखाते हैं कि ये देसी टायर हैं। फिर वो क्रेडिट टायर प्रोड्यूसर्स को बेच देते हैं। जितना ज्यादा जलाते हैं, उतना ज्यादा कमाते हैं।”

प्लांट के अंदर: जहरीली हकीकत

लोहगढ़ (मुरैना) और कलापीपल (शाहपुर जिला) के टायर पायरोलिसिस फैक्टरियों के बंद दरवाजों के पीछे, द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने एक बेहद खतरनाक और दुखद हकीकत का पर्दाफाश किया है—जहाँ पर्यावरण के नियमों को तोड़कर मुनाफे के लिए इंसानी जिंदगियाँ चुपचाप दांव पर लगाई जा रही हैं।

मजदूर रोज़ाना 500-800 रुपये कमाते हैं। वो जलते हुए भट्टियों में टायर डालते हैं, उनका पूरा बदन कालिख और पसीने से तर-बतर होता है। वे बिना ग्लव्स, मास्क या हेलमेट के, वो बेहद खतरनाक हालात में काम करते हैं। “हमें बस सर्फ या रिन का साबुन मिलता है नहाने-धोने के लिए,” राजेश कुमार (42 साल), आगरा के एक मजदूर ने बताया। वो थोड़ी ज़्यादा कमाई के लालच में यहाँ आए थे, ताकि अपने चार सदस्यों वाले परिवार का गुज़ारा चल सके।

विकास गुज्जर (18 साल) मध्य प्रदेश के मुरैना ज़िले में लोहगढ़ के एक टायर पायरोलिसिस प्लांट में दिन में 10 घंटे से ज़्यादा काम करता है, बिना किसी सुरक्षा उपकरण के। वो रोज़ 500 रुपये कमाता है। दिन भर काम करने के बाद उसे सिर्फ साबुन मिलता है, जिससे वो अपने कालिख से सने बदन और कपड़ों को साफ कर सके। फोटो क्रेडिट: काशिफ काकवी

“हमें साँस लेने में तकलीफ होती है। जब बॉयलर के दरवाजे खुलते हैं, तो बहुत से लोग उल्टी कर देते हैं,” राजेश ने अपना अनुभव बताया। वो फैक्टरी के अंदर ही एक झोपड़ी जैसी जगह में रहता है। “कोई भी इंसान यहाँ कुछ महीनों से ज़्यादा नहीं टिक सकता। मज़दूर हर 30 दिन में बदल जाते हैं।”

इन यूनिट्स के अंदर लगभग हर वो शर्त तोड़ी जा रही है, जो 2025 के एसओपी में तय की गई हैं। ऐसा प्रोफेसर मवाई कहते हैं, जो पिछले एक दशक से इन प्लांट्स को बंद करवाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।

“यहाँ पिछले दो साल में हमने दर्जनों से ज्यादा कैंसर से मौतें डॉक्यूमेंट की हैं। और भी बहुत से लोग ऐसे ही लक्षण दिखा रहे हैं। सांस की बीमारी तो बुखार जितनी आम हो गई है,” वो कहते हैं, और लेटेस्ट एयर और वॉटर क्वालिटी रिपोर्ट्स लहराते हुए। “फिर भी फैक्ट्री मालिकों को एक बड़े-भारी नेता का संरक्षण मिला हुआ है, और वॉचडॉग एजेंसियों से पूरी छूट।”

पर्यावरण कार्यकर्ता राशिद नूर खान के मुताबिक, ये हेज़र्डस वेस्ट रूल्स के रूल 4(6)(b) का उल्लंघन है, जिसमें वर्कर्स के लिए प्रोटेक्टिव गियर और ट्रेनिंग अनिवार्य है। लेकिन मास्क या चश्मे की जगह मजदूरों को गुड़ के टुकड़े थमा दिए जाते हैं। “वे कहते हैं कि इससे कार्बन डस्ट, जो तुम्हारी सांस की नली में अटक जाती है, वो पेट में चली जाती है,” एक मजदूर ने उदास होकर कहा।

वे बताते हैं कि काला कार्बन उनकी त्वचा के रोमछिद्रों में भर जाता है, पसीना भी नहीं निकल पाता, और फेफड़ों से कालिख खांसकर निकलती है। “बिना प्रोटेक्शन के लंबे समय तक ऐसे एक्सपोजर से गंभीर फेफड़ों को नुकसान हो सकता है,” पर्यावरण विशेषज्ञ सागर धारा ने चेतावनी दी।

शिकायतें बढ़ती जा रही हैं, लेकिन राज्य और लोकल प्रशासन ज्यादातर बेपरवाह बने हुए हैं। “ऐसा लगता है जैसे फैक्ट्रियां अधिकारियों को दिखती ही नहीं,” मावई ने कहा।

2019 से 2025 के बीच मध्य प्रदेश पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड को ऐसी 18 प्लांट्स के खिलाफ शिकायतें मिलीं। कुछ को बंद करने के नोटिस भी जारी हुए, लेकिन जून 2025 में नई शिकायतों के बाद एक SIT (स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम) बनाई गई, जिसने सभी फैक्ट्रियों को क्लीन चिट दे दी।

“उनकी जांच के आधार पर तीन प्लांट्स—पितांबरा इंडस्ट्रीज, अंजलि बायोफ्यूल्स, और आरवी ग्रीन—को बंद करने के नोटिस जारी किए गए थे। सभी ने मौजूदा कानूनों का पालन करने के बाद दोबारा खोल दिए गए,” ग्वालियर के रीजनल पीसीबी ऑफिसर ऋषि सिंह सेंगर ने कहा। “और नौ और प्लांट्स को एसओपी का पालन करने के लिए वार्निंग दी गई।”

उन्होंने ये बात दोहराई कि हवा की क्वालिटी लिमिट के अंदर ही है और लकड़ी का इस्तेमाल सिर्फ इग्निशन के लिए किया जाता है। लेकिन आयातित टायरों को अवैध तरीके से प्रोसेस करने के आरोपों पर उन्होंने कोई जवाब देने से साफ इनकार कर दिया।

स्थानीय लोग हालांकि अब भी नहीं मान रहे। नेशनल पहलवान संजू पहलवान ने कहा, “पानी तीन सौ फीट तक दूषित हो चुका है। नंगी आँखों से काले कार्बन के कण दिख रहे हैं।”

मध्य प्रदेश के लिए ढेर सारे मेडल जीत चुके संजू इन फैक्टरियों को बंद करवाने की लड़ाई लड़ रहे हैं—शिकायतें दर्ज करवा रहे हैं, हाईवे जाम कर रहे हैं, सोशल मीडिया पर फैक्टरियों के अंदर SOP के उल्लंघन को उजागर कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “जब भी हम विरोध करते हैं, इंस्पेक्शन बस दिखावे के लिए होता है। मालिकों को पहले ही खबर मिल जाती है, वो काम बंद करवा देते हैं, साफ-सफाई करवा लेते हैं और नकली रिकॉर्ड तैयार कर लेते हैं। सब कुछ सिर्फ आँखों में धूल झोंकने वाला काम है।”

फिर भी, सभी लोग इन प्लांट्स को दुश्मन नहीं मानते। कई लोगों के लिए तो यही एकमात्र रोज़गार का ज़रिया है।

22 साल का धीरज गुज्जर एक फैक्ट्री से बस कुछ मीटर दूर रहता है और गर्व से अपना आईडी बैज दिखाता है। उसने कहा, “मुझे महीने के 15-20 हज़ार रुपये मिलते हैं। इससे परिवार चलता है। हममें से ज़्यादातर अनपढ़ हैं। जीविका चलाने के और कौन से रास्ते हैं हमारे पास?”

धीरज का भी ये मानता है कि पानी दिन-ब-दिन और खराब हो रहा है। उसने गांव के पीछे वाले तालाब की तरफ इशारा करते हुए कहा, “हर साल ये और गहरा काला होता जा रहा है।” चाँदनी रात में तालाब की सतह चमक रही है—पवित्रता से नहीं, बल्कि तेल-जैसे कचरे की चिकनी परत से। एक ज़हरीला आईना, जो पूरे इलाके के चुपके से किए गए समझौते को दिखा रहा है।

इस रिपोर्ट का हिंदी में अनुवाद कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की मदद से किया गया है। पूर्ण सटीकता के लिए कृपया अंग्रेजी में मूल रिपोर्ट देखें।