इस रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से किया गया है। सटीक रिपोर्ट पढ़ने के लिए कृपया अंग्रेजी में प्रकाशित मूल प्रति का संदर्भ लें

नई दिल्ली: शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित का विवादों से सीधा वास्ता रहा है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की कुलपति, पंडित, पिछले कुछ हफ्तों से सुर्खियों में छाई हुई हैं। उनकी कथित जातिवादी टिप्पणियों को लेकर उनका भारी विरोध हुआ है, छात्रों के प्रदर्शन तेज हुए हैं और अब JNU स्टूडेंट यूनियन की अगुवाई में कैंपस से उनको हटाए जाने पर जनमत संग्रह (रेफरेंडम) चल रहा है। दिल्ली के इस केंद्रीय विश्वविद्यालय में छात्रों का प्रदर्शन फरवरी की शुरुआत में चालू हुए थे और अब इस प्रदर्शन में तेजी आ गई है। पंडित के ख़िलाफ़ चालू ये विरोध प्रदर्शन अब छात्रों के निलंबन, प्रशासन और छात्रों के बीच जारी झड़पों से होते हुए पंडित के इस्तीफे की मांग तक पहुंच गया है।

स्टूडेंट यूनियन और कुछ प्रोफेसरों के एक हिस्से की अगुवाई में पंडित पर भर्ती में भ्रष्टाचार और विश्वविद्यालय में परीक्षाओं में धांधली करने का आरोप लगाया जा रहा है। उनके हटाए जाने की मांग के बीच कैंपस में हो रहे इस अशांति ने पुराने आरोपों को भी फिर से सुर्खियों में ला दिया है। JNU स्टूडेंट यूनियन अब इन्हीं आरोपों को अपने मामले का मुख्य आधार बना रहा है।

पंडित को 7 फरवरी 2022 को JNU की कुलपति नियुक्त किया गया था। उस समय वे सावित्रीबाई फुले विश्वविद्यालय (पहले पुणे विश्वविद्यालय) में प्रोफेसर थीं। उनकी नियुक्ति काफी धूमधाम से हुई थी। वे इस प्रतिष्ठित संस्थान की पहली महिला कुलपति बनीं और, जैसा कि वो ख़ुद बहुत से इंटरव्यूज़ में कहती रही हैं, वो एक पिछड़े वर्ग से आती हैं। शांतिश्री मामिडाला जगदीश कुमार के बाद कुलपति बनीं थी, जो खुद विवादास्पद कुलपति रहे थे। JNU की पहली महिला कुलपति होने और सत्ताधारी पार्टी से नजदीकी की वजह से पंडित मीडिया की पसंदीदा रहीं हैं।

लेकिन तारीफों और पारम्परिक सीमाओं को तोड़ने की बातों के बीच भी, उनकी नियुक्ति के समय, कुछ चुनिंदा रिपोर्टों में उनके पिछले द्वरा अपने पिछले संस्थान में कथित कदाचार करने का जिक्र था। साल 2008 में, पंडित पर पुणे विश्वविद्यालय में कार्यवाही हुई थी। उन पर ये कार्यवाही अपनी प्रोफेसरशिप के अलावा पुणे यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल स्टूडेंट्स सेंटर के  डायरेक्टर के रूप में एक अतिरिक्त कार्यभार संभालने को लेकर हुई थी।  

हालांकि इस जांच से कोई औपचारिक दोषसिद्धि या सजा नहीं हुई, लेकिन उनके आलोचकों का मानना है कि भ्रष्टाचार के इस मामले को ज्यादा गंभीरता से लिया जाना चाहिए था। पंडित अक्सर इन आरोपों को खारिज करती रही हैं। कम से कम एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, “जो लोग ये आरोप लगाते हैं, उन्हें कोई सबूत पेश करना चाहिए। मेरे खिलाफ कुछ भी साबित नहीं हुआ था।”

इंटरव्यू में ये बात बोलते हुए पंडित टालमटोल कर रहीं थीं।

उनके अतीत पर अब फिर से चर्चा शुरू हो गई है। द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने उस मामले से जुड़े दस्तावेज़ हासिल किए हैं। इन दस्तावेज़ों से पता चलता है कि 2009 में पंडित को सिर्फ़ "नैतिक अधमता" (moral turpitude) के लिए न सिर्फ़ आरोपित किया गया था बल्कि इसके लिए उन्हें औपचारिक रूप से सजा भी दी गई थी। दस्तावेजों के दूसरे पुलिंदे से इस बात का खुलासा होता है कि — शिलांग की केंद्रीय विश्वविद्यालय नॉर्थ-ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी (NEHU) ने उन्हें अपना कुलपति बनाने के लिए उनको अयोग्य ठहरा दिया था। और NEHU में कुलपति के लिए अयोग्य ठहराये जाने के सिर्फ़ एक साल बाद पंडित को JNU का कुलगुरु बना दिया गया।

एक और खास दस्तावेज़ों की फ़हरिश्त से यह बात सामने निकल कर आती है कि आखिरकार JNU में जिन्होंने उन्हें चुना, उस चयन समिति का गठन असहमति जताने वाली आवाज़ों को पूरी तरह दबाकर किया गया था।

इन दस्तावेज़ों की समीक्षा करने पर एक साफ़ सवाल है कि, JNU और NEHU, दोनों ही केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं और अपने-अपने एक्ट के तहत कुलपति की नियुक्ति के लिए लगभग एक जैसे नियमों से चलते हैं।

तो, JNU के छात्र संघ और शिक्षक संघ के लोग तर्क दे रहे हैं कि अगर पंडित के खिलाफ अनियमितताओं के आरोप इतने गंभीर थे कि NEHU ने इन आरोपों को देखते हुए पंडित को अयोग्य ठहरा दिया तो जेएनयू—जो कहीं बड़ा और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय है—ने उन्हें सर्वोच्च पद सौंपने से पहले उनके पिछले रिकॉर्ड की ठीक से जांच क्यों नहीं की?

भारत के सर्वोच्च उच्च शिक्षा निकाय, यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी) की तरफ़ से वर्ष 2018 में जारी किए गए भर्ती नियमों में लिखी इस बात का संज्ञान लेने पर कि “उच्चतम स्तर की योग्यता, सत्यनिष्ठा, नैतिकता और संस्थागत प्रतिबद्धता वाला व्यक्ति ही कुलपति के रूप में नियुक्त किया जाना चाहिए” उपरोक्त लिखित प्रश्न और भी गहरा हो जाता है।

यूजीसी के नियम स्पष्ट करते हैं कि कुलपति के पद पर नियुक्त होने वाला व्यक्ति  उच्चतम स्तर की सत्यनिष्ठा और नैतिकता वाला होना चाहिए।

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सत्ता का दुरुपयोग

1998 में, पंडित को पुणे विश्वविद्यालय ने राजनीति विज्ञान और लोक प्रशासन विभाग में रीडर के पद पर नियुक्त किया था। 5 अप्रैल 2001 को उन्हें विश्वविद्यालय के इंटरनेशनल स्टूडेंट्स सेंटर (ISC) का अतिरिक्त प्रभार दिया गया। यह सेंटर विदेशी छात्रों की एडमिशन प्रक्रिया संभालता था—जिसमें भारतीय मूल के व्यक्ति (PIO), खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीयों के बच्चे, और दक्षिण-पूर्व एशिया में विदेशी पासपोर्ट रखने वाले भारतीय मजदूर शामिल थे। दाख़िलें के दौरान इन सभी विद्यार्थियों को AICTE और UGC के द्वारा निर्धारित 15% कोटे के तहत आरक्षण दिया जाता था।

पंडित ने 2002 से 2007 तक ISC का नेतृत्व किया। ISC से उनकी विदाई के बाद उनके ख़िलाफ़ एक शिकायत दर्ज कराई गई। 2008 की शुरुआत में, पुणे यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन के कार्यकारी परिषद सदस्य अतुल गोविंद बागुल ने आरोप लगाया कि पंडित के कार्यकाल में विश्वविद्यालय ने लगभग 1,800 अयोग्य भारतीय छात्रों को PIO आरक्षित सीटों पर विभिन्न प्रोफेशनल कोर्स में दाखिला दिया था। आरोप था कि नियमों को दरकिनार करते हुए चुपके से PIO या विदेशी पासपोर्ट धारक होने की परिभाषा बदल दी गई थी।

इसके तुरंत बाद, पुणे विश्वविद्यालय ने सुनंदा पवार की अध्यक्षता में चार सदस्यीय समिति गठित की, जो  पंडित के ख़िलाफ़ दर्जा की गईं शिकायतों की जाँच करने वाली थी। 6 अगस्त 2008 को अपनी रिपोर्ट जमा करते हुए समिति के सभी सदस्य एकमत से इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि संभावित रूप से पंडित के कार्यकाल में “वित्तीय गबन” हुआ था।

पवार समिति की सिफारिश पर, तब के विश्वविद्यालय के कुलपति ने आखिरकार पंडित के खिलाफ औपचारिक अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू कर दी और सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति जे. ए. पाटिल की अध्यक्षता वाली अनुशासनात्मक जांच समिति ने स्पष्ट टिप्पणी की है कि PIO कोटे की खाली सीटों को किसी भी स्थिति में “उपरोक्त उल्लिखित श्रेणियों के छात्रों के अलावा किसी अन्य छात्र को” आवंटित नहीं किया जा सकता। और अंत में 28 अगस्त 2008 को पंडित के ख़िलाफ़ चार्जशीट दाखिल कर दी गई थी।

नाममात्र का दंड

जांच के दौरान पंडित और उनके वकीलों ने उन्हें बचाने के खूब बहसबाजी करते हुए लड़ाई लड़ी। लिखित रूप में एक तर्क देते हुए उन्होंने कहा कि, ISC विदेश मंत्रालय के अधीन आता है, न कि AICTE या UGC के, इसलिए ISC में AICTE या UGC के आरक्षण नियम लागू नहीं होते। उन्होंने यह भी कहा कि ISC के दाखिले के मामले में पुणे विश्वविद्यालय को चार्जशीट जारी करने का कोई अधिकार (locus standi) नहीं है, क्योंकि ISC केंद्रीय सरकार के दायरे में आता है।

अनुशासनात्मक कार्यवाही के दौरान पंडित ने तर्क दिया कि चूंकि ISC केंद्रीय सरकार के दायरे में आता है, पुणे विश्वविद्यालय को उनके मामले हस्तकक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है।

पंडित ने यह भी दावा किया कि उन्हें टीचर स्टैच्यूट्स के तहत जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि ISC में उनकी भूमिका ऐसे अतिरिक्त प्रभारी के रूप में थी जिसको इस अतिरिक्त प्रभार की लिए कोई वेतन नहीं मिलता था, इसलिए उनको महाराष्ट्र यूनिवर्सिटीज़ एक्ट, 1994 के तहत कानूनी रूप से 'टीचर' नहीं माना जा सकता।

जस्टिस पाटिल ने उनकी ज्यादातर दलीलों को खारिज कर दिया। पूना यूनिवर्सिटी एक्ट, 1974 और UGC के प्रोफेशनल एथिक्स कोड से समर्थित पुणे विश्वविद्यालय के टीचर स्टैच्यूट बुक के स्टैच्यूट 431 का हवाला देते हुए पाटिल ने पंडित को "कदाचार" (misconduct) और "नैतिक अधमता" (moral turpitude) का दोषी पाया।

पाटिल ने अपनी जांच में बेहद स्पष्ट थे। पाटिल ने लिखा कि पंडित ने 15% आरक्षण के नियम की जिस तरह व्याख्या की, “यह उनकी चिंता को दिखाता है कि परिभाषा के दायरे को कैसे बढ़ाया जाए।” पाटिल ने आगे कहा, “उनका व्यवहार निष्पक्ष और उचित नहीं लगता और उन्होंने जो किया उससे बेईमानी की बदबू आती है... यह स्पष्ट रूप से उनकी शक्ति और पद का दुरुपयोग या गलत इस्तेमाल था।” पाटिल ने यह भी नोट किया कि पंडित ने ISC के रिकॉर्ड नष्ट करने की कोशिश की थी। पाटिल के अनुसार “यह नहीं पता कि ऐसा करने की उन्हें इतनी जल्दबाजी और बेचैनी क्यों थी।” पाटिल एक बात पर बहुत साफ थे कि अनुशासनात्मक कार्यवाही में “संदेह से परे सबूत” का मानक लागू नहीं होता।

जस्टिस पाटिल जांच समिति दिखाती है कि पंडित ने पुणे विश्वविद्यालय में ISC के रिकॉर्ड नष्ट करने की कोशिश की थी।

सजा के तौर पर, हमें NEHU के एक और दस्तावेज़ से पता चलता है कि दाखिले के नियमों का उल्लंघन करने के दंड के रूप में पंडित के वेतन वृद्धि की सात बढ़ोतरियों- 2011 से पांच और 2017 से दो- को स्थायी रूप से रोक दिया गया था।

द कलेक्टिव से बातचीत में बागुल ने सजा को बहुत हल्की बताया। उन्होंने कहा कि “यूनिवर्सिटी को उन पर एफआईआर दर्ज करानी चाहिए थी क्योंकि जो पंडित ने किया, वह एक आपराधिक कृत्य था, दोषी पाए जाने और उसके बाद सजा मिलने के बावजूद पंडित अभी भी JNU  में पद संभाल रही हैं।” वर्तमान में जो सवाल फिर से उभार मार रहा है वो ये है कि कि क्या पंडित को JNU  की चाबी सौंपने से पहले इनमें से किसी बात पर विचार किया गया था।

सजा मिली, फिर भी ऊँचाई छुई

पंडित को सात साल की सजा मिली थी। लेकिन 2021 में जब उन्होंने नॉर्थ-ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी (NEHU) की कुलपति बनने के लिए आवेदन किया, तो उनका पुराना मामला झट से सामने आ गया।

5 से 7 जनवरी 2021 के बीच, नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में 38 शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों का NEHU ने इंटरव्यू लिया था। सूची को घटाते हुए NEHU ने अपने नए कुलपति के लिए पाँच नामों पर मन बनाया था। पंडित का नाम इन पाँच नामों में शामिल था। सभी शॉर्टलिस्ट उम्मीदवारों की जाँच के दौरान NEHU ने पंडित के पिछले संस्थान—पुणे यूनिवर्सिटी—को पत्र लिखा। NEHU ने पत्र में पूछा कि क्या पिछले दस साल में पंडित के खिलाफ किसी सतर्कता (vigilance) से जुड़े कदाचार की जाँच हुई थी कि नहीं? NEHU के दस्तावेज़ के अनुसार, पाँच में से सिर्फ़ पंडित के ही पुराने रिकॉर्ड्स में समस्या पाई गई। दस्तावेज़ में पता चला कि टीचर्स स्टैट्यूट्स की किताब में स्टैच्यू 431 के तहत पंडित की वेतन वृद्धि को स्थायी रूप से रोक दिया गया था।

NEHU में कुलपति की चयन प्रक्रिया के दौरान जमा की गई सतर्कता स्थिति रिपोर्ट में पंडित का पुराना कदाचार दिखाई दे रहा है।

पंडित को नौकरी नहीं मिली। जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष सुरजीत मजूमदार का मानना है कि उनका अनुशासनात्मक रिकॉर्ड ही उनको NEHU में चयनित न किए जाना का कारण था। मजूमदार ने कहा कि, “उन्हें NEHU की कुलपति की पोस्ट के लिए विचारात्मक प्रतिभागियों की लिस्ट से बाहर कर दिया गया था।”

NEHU में चयन न होने के एक साल बाद पंडित को JNU में कुलपति के पद पर नियुक्त कर दिया गया।

पंडित की JNU में नियुक्ति के समय छात्र संगठनों, शिक्षक संगठनों, मीडिया रिपोर्ट्स और यहां तक कि राजनीतिक नेताओं ने भी सार्वजनिक रूप से सवाल उठाया था कि क्या केंद्र सरकार और उसकी चयन प्रक्रिया ने प्रोफेसर शांतिश्री पंडित को JNU का कुलपति नियुक्त करते वक्त पुणे विश्वविद्यालय में उनके ख़िलाफ़ चली अनुशासनात्मक कार्रवाई को ध्यान में रखा भी कि नहीं।

महाराष्ट्र के तत्कालीन उच्च शिक्षा मंत्री उदय सामंत ने दावा किया था कि सतर्कता रिपोर्ट और संबंधित दस्तावेज़ केंद्रीय सतर्कता अधिकारियों को भेजे गए थे। उन्होंने कहा कि अगर अधिकारियों ने पंडित को मिली सजा के बावजूद उन्हें पास कर दिया तो इसके लिए किसी को तो जवाब देना होगा। इससे ये पता चलता है कि JNU में पंडित की नियुक्ति के समय पंडित के ख़िलाफ़ केंद्रीय स्तर सतर्कता रिपोर्ट दी गई थी।

मजूमदार ने कहा कि, “जब प्रोफेसर शांतिश्री पंडित हमारी यूनिवर्सिटी में कुलपति के रूप में आईं, तब हमें पता था कि पुणे विश्वविद्यालय में अनुशासनात्मक कार्रवाई में उन्हें कदाचार के लिए दोषी पाया गया था और सजा दी गई थी… हमने इस बात को लंबे समय तक नहीं उठाया,” उनके अनुसार, उन्होंने इसके बजाय पंडित का JNU कुलपति के रूप में जो वर्ताव होगा उसके आधार पर उनका आकलन करने का फैसला किया। लेकिन सितंबर 2025 में, जब अपनी कथित “निजी दुश्मनी” के चलते उन्होंने राजनीतिक अध्ययन केंद्र के एक प्रोफेसर को गैरकानूनी तरीके से बर्खास्त कर दिया गया, तब स्थिति बदल गई।

मजूमदार ने कहा कि, “यह तब हुआ जब उनका व्यवहार बुरे से बदतर हो गया... हमें यह उजागर करने के लिए मजबूर होना पड़ा कि खुद उस पर भी नैतिक रूप से अधम होने के गंभीर आरोप सिद्ध हो चुके हैं,”।

1966 के JNU एक्ट के तहत, कुलपति की नियुक्ति विजिटर द्वारा की जाती है, जो भारत के राष्ट्रपति की एक संवैधानिक भूमिका है। व्यवहार में, इस प्रक्रिया पर केंद्रीय सरकार का निर्णायक प्रभाव होता है। चयन समिति में तीन सदस्य होते हैं जिनमे से दो सदस्यों को JNU  की कार्यकारी परिषद नामित करती है, और एक सदस्य राष्ट्रपति द्वारा नामित किया जाता है। चूंकि राष्ट्रपति को नामित किसी भी सदस्य को अस्वीकार करने का विशेषाधिकार है इसलिए कुलपति के चयन के दौरान सरकार की पसंद ही आमतौर पर हावी रहती है।

JNU में पंडित की नियुक्ति के समय चयन समिति की संरचना पर भी सवाल खड़े होते हैं। पंडित की नियुक्ति के समय JNU में तीन सदस्यों वाली सर्च-कम-सेलेक्शन कमिटी में के. के. अग्रवाल, योगेंद्र नारायण और अशोक गजानन मोड़क शामिल थे। जहाँ अग्रवाल वर्तमान में साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के प्रेसिडेंट हैं वहीं योगेंद्र नारायण एक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी के रूप में राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के तौर पर चयन समिति का हिस्सा बने थे। इन दो के अतिरिक्त अशोक गजानन मोड़क एक शिक्षाविद् और आरएसएस से संबद्ध छात्र संगठन- एबीवीपी- के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में JNU में कुलपति के चयन के दौरान चयन समिति में शामिल थे।

कोविड-19 महामारी के बीच JNU में नए कुलपति की तलाश सितंबर 2020 में शुरू हुई थी। सितंबर में कुलपति द्वारा नियुक्त की गई एक टीम की ज़ूम मीटिंग के द कलेक्टिव को मिले एक्सक्लूसिव मिनिट्स के अनुसार इस मीटिंग में सर्च-कम-सेलेक्शन कमिटी के लिए छह नाम सुझाए गए थे। लेकिन जब JNU  की कार्यकारी परिषद मिली तो पता चला कि JNU द्वारा नामित दो सदस्यों का फैसला पहले ही लिया जा चुका था।

JNU की कार्यकारी परिषद में नामित सदस्यों की बहुलता के बीच निर्वाचिन तरीके से आने वाले सिर्फ़ तीन फैकल्टी प्रतिनिधियों ने सर्च-कम-सेलेक्शन कमिटी के नामों पर अपनी औपचारिक असहमति दर्ज कराई।

1. वीसी सर्च-कम-सेलेक्शन कमिटी के नाम सुझाने के लिए हुई ऑनलाइन मीटिंग की मिनट्स।; 2. JNU एग्जीक्यूटिव काउंसिल की मीटिंग रिकॉर्ड्स दिखाती हैं कि तीन निर्वाचित सदस्यों ने कमिटी के सुझाए नामों के खिलाफ औपचारिक रूप से असहमति दर्ज की थी।

असहमति जताने वाली सदस्यों में से एक प्रोफेसर मौसमी बसु ने कहा कि “जिस वीडियो मीटिंग में JNU प्रशासन ने सेलेक्शन कमिटी के लिए पहले छह नाम प्रस्तावित किए, वह मीटिंग बहुत अचानक बुलाई गई थी, और नियम इसकी इजाज़त नहीं देते हैं,”। बाद में बसु ने JNU  रजिस्ट्रार को लिखा कि “सदस्यों (सर्च-कम-सेलेक्शन कमिटी के नाम) अचानक थोप दिए गए और सदस्यों को नए नाम सुझाने की इजाज़त न देकर, (वीसी नियुक्ति पर) खुली चर्चा की गुंजाइश को कमज़ोर किया गया” – एक परंपरा, उन्होंने संकेत दिया, जिसका पालन नहीं किया गया।

जब इस रिपोर्टर ने अग्रवाल से पूछा – जो JNU द्वारा नामित दो सदस्यों में से एक थे– कि क्या पंडित की सिफारिश किए जाने के पहले उन्होंने पुणे यूनिवर्सिटी से पंडित की विजिलेंस रिपोर्ट देखी थी। इस सवाल पर अग्रवाल ने कहा कि उन्होंने ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं देखी थी। उनके अनुसार, अगर उन्होंने ऐसी कोई रिपोर्ट देखी होती तो वे इसे ध्यान में रखते।

JNU और नॉर्थ-ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी (NEHU) दोनों ही क्रमशः1966 और 1973 में  संसद द्वारा पारित अधिनियमों से स्थापित केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं। वाइस चांसलर नियुक्त करने की उनकी प्रक्रिया लगभग एक जैसी है, जिसमें भारत के राष्ट्रपति के पास औपचारिक अधिकार है, हालांकि व्यवहार में केंद्रीय सरकार ही इस प्रक्रिया को निर्देशित करती है।

JNU और NEHU में कुलपति की नियुक्ति के लिए लगभग एक समान प्रक्रियाएँ अपनाई जाती हैं।

तो वही रिकॉर्ड, जो संभावित रूप से NEHU में पंडित की नियुक्ति के खिलाफ जा रहा था उसी रिकॉर्ड के आधार पर एक साल बाद JNU में पंडित का रास्ता कैसे साफ हो गया? इस प्रश्न को लेकर JNU के छात्रों और शिक्षकों के समूहों में अलग-अलग राय दिखाई दे रही हैं।

इन फैसलों के पीछे के कारणों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की जा सकी। रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने तीनों विश्वविद्यालयों के रजिस्ट्रारों को विस्तृत प्रश्नावली भेजी है, जिसमें NEHU में पंडित की अस्वीकृति औरJNU में उनकी नियुक्ति के बारे में जवाब मांगे गए हैं। जवाब मिलने पर इस खबर को अपडेट किया जाएगा।