यूरोप में प्रतिबंधित सर्विलांस तकनीक का भारत में धड़ल्ले से प्रयोग

यूरोप में जिस सर्विलांस तकनीक के इस्तेमाल पर कड़े नियम लागू हैं, वहीं भारत में इसका व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जा रहा है। स्पेन की कंपनी हर्टा सिक्योरिटी भारत में फेशियल रिकग्निशन तकनीक उपलब्ध कराने वाली प्रमुख कंपनियों में शामिल है।

कोलकाता के हावड़ा रेलवे स्टेशन पर ट्रेनों की आवाजाही शायद ही कभी रुकती है। और यहां लगे कैमरे भी कभी नहीं रुकते। हावड़ा देश के व्यस्ततम स्टेशनों में से एक है जहां हर दिन करीब 10 लाख लोग आते-जाते हैं। इतनी भारी भीड़ में हर किसी पर नजर रखना इंसानों के लिए लगभग असंभव है।

लेकिन स्टेशन के प्रवेश और निकास द्वारों, प्लेटफॉर्म, फूड कोर्ट और प्रतीक्षालयों में लगे करीब 100 कैमरे लगातार हर चेहरे को खंगालते हैं। पिछले साल लगाए गए यह कैमरे लाइव वीडियो से लोगों के चेहरे पहचानकर उन्हें एक डेटाबेस से मिलाते हैं, जिसमें वांछित अपराधियों, संदिग्धों और लापता लोगों की तस्वीरें होती हैं। यदि कोई चेहरा मेल खाता है, तो रेलवे पुलिस को तुरंत सूचना मिलती है कि वह व्यक्ति कहां देखा गया है। इसके बाद पुलिस उसे रोक सकती है।

कई यात्रियों को यह भी पता नहीं कि उनकी इस तरह निगरानी हो रही है। एक निजी कंपनी में काम करने वाली बरनाली बिस्वास सप्ताह में छह दिन इस स्टेशन से गुजरती हैं। जब उनसे इस पर सवाल किया गया तो उन्हें कोई समस्या नहीं लगी। उनके अनुसार यह शायद सुरक्षा के लिए अच्छा है। "जिनका अपराध से कोई संबंध नहीं है, उन्हें डरने की जरूरत नहीं," उन्होंने कहा।

चेहरे पहचानने वाले ऐसे कैमरे अब भारत के कई हिस्सों में आम होते जा रहे हैं। पूर्वी भारत में इस तकनीक की आपूर्ति करने वाली कंपनियों में स्पेन की हर्टा सिक्योरिटी प्रमुख है।

कंपनी के स्थानीय साझेदारों और दस्तावेजों के मुताबिक, हर्टा का सॉफ्टवेयर पूर्वी भारत के सैकड़ों रेलवे स्टेशनों, दिल्ली की तिहाड़ जेल, अयोध्या के राम मंदिर और गुजरात के अहमदाबाद शहर के कंट्रोल रूम्स में इस्तेमाल हो रहा है।

एक लिखित बयान में हर्टा ने भारत में अपनी तकनीक के इस्तेमाल की पुष्टि की, लेकिन "ग्राहकों से जुड़ी गोपनीय जानकारी" देने से इंकार कर दिया। संभव है कि हावड़ा स्टेशन पर भी कंपनी का ही सिस्टम लगा हो, हालांकि स्थानीय रेलवे अधिकारियों ने इसकी पुष्टि नहीं की।

हर्टा के एक भारतीय साझेदार के मुताबिक, भारत में लगभग 4,000 कैमरे कंपनी की तकनीक से चल रहे हैं। 

भारत में हर्टा की एक साझेदार कंपनी के एक सूत्र ने इन्वेस्टिगेट यूरोप को बताया कि उनके अनुमान के मुताबिक, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में अब 4,000 से अधिक कैमरे स्पेन की इस कंपनी की तकनीक से संचालित हो रहे हैं। द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने इस जांच में भारत की ओर से सहयोग किया।

सर्विलांस कैमरों के इस जाल का एक सिरा निर्भया फंड से भी जुड़ता है। दिल्ली में 2012 में हुए दिल दहला देने वाले सामूहिक दुष्कर्म के बाद महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा से निपटने के लिए इस सार्वजनिक कोष की स्थापना की गई था। भारत में महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों का कहना है कि इस फंड के लिए आवंटित करोड़ों रुपए पीड़ितों की सुरक्षा और सहायता पर खर्च करने के बजाय व्यापक निगरानी व्यवस्था (मास सर्विलांस) पर खर्च किए गए।

यूरोपीय संघ में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और बायोमेट्रिक्स कानून के चार प्रमुख विशेषज्ञों के अनुसार, इनमें से दो निगरानी प्रणालियों को यूरोपीय संघ में गैरकानूनी माना जाता -- भारतीय रेलवे के ईस्टर्न रीजन की निगरानी प्रणाली और अहमदाबाद का शहर-व्यापी सर्विलांस प्रोग्राम।

हर्टा ने कहा कि वह ऐसी चिंताओं को गंभीरता से लेती है। कंपनी के मुताबिक, उसके उत्पाद "यूरोपीय डेटा सुरक्षा सिद्धांतों के अनुरूप विकसित किए जाते हैं, चाहे उनका इस्तेमाल किसी भी देश या बाजार में किया जाए।" हालांकि कंपनी ने यह भी कहा कि "सरकारी एजेंसियां या सिस्टम इंटीग्रेटर अलग-अलग जगहों पर इस तकनीक का इस्तेमाल किस तरह करते हैं इसपर उसका नियंत्रण नहीं है"।

हालांकि, यूरोपीय संसद के इतालवी सदस्य ब्रांडो बेनिफेई ने कहा कि इस जांच से यूरोपीय विधि निर्माताओं के सामने गंभीर सवाल खड़े होते हैं। उन्होंने कहा, "यूरोप में प्रतिबंधित सर्विलांस तकनीकों का भारत जैसे दूसरे देशों में निर्यात और रेलवे स्टेशनों आदि स्थानों पर इस्तेमाल किया जाना एक खतरनाक दोहरे मापदंड का संकेत है।"

यूरोपीय संघ ने अपने नागरिकों पर इसी तरह के सर्विलांस पर कड़े प्रतिबंध लगा रखे हैं। लेकिन इन्वेस्टिगेट यूरोप की जांच में पता चला कि ईयू ने स्पेन की इस कंपनी को अपनी तकनीक विकसित करने के लिए वित्तीय मदद भी दी। वर्ष 2020 से अब तक हर्टा को 'भीड़ के व्यवहार का विश्लेषण' और चेहरे की पहचान (फेशियल रिकग्निशन) से जुड़ी परियोजनाओं के लिए यूरोपीय संघ से 33 लाख यूरो (2024 की विनिमय दर के अनुसार लगभग 30 करोड़ रुपए) से अधिक की शोध सहायता मिल चुकी है।

स्पेन में बनी सर्विलांस तकनीक

हर्टा सिक्योरिटी की स्थापना 2009 में बार्सिलोना में बॉश के पूर्व कर्मचारी जेवियर रोड्रिगेज साएता ने की थी। वह बायोमेट्रिक्स के विशेषज्ञ हैं। बायोमेट्रिक्स ऐसी तकनीक है जिसमें लोगों की शारीरिक विशेषताओं या व्यवहार के आधार पर उनकी पहचान की जाती है। रोड्रिगेज ने 2019 में दिए एक साक्षात्कार में कहा था, "मुझे 2005 में ही लग गया था कि भविष्य में ऐसे लोगों की पहचान करना जरूरी होगा जो अपनी पहचान छिपाना चाहते हों।"

आज कंपनी का प्रमुख उत्पाद बायोसर्विलांस नेक्स्ट (BioSurveillance NEXT) है। कंपनी की प्रचार सामग्री के अनुसार इसे बड़ी भीड़ की निगरानी के लिए ही तैयार किया गया है। रोड्रिगेज ने "प्रदर्शनों, खेल प्रतियोगिताओं, धार्मिक आयोजनों और हवाई अड्डों" पर इसके इस्तेमाल का ज़िक्र किया है। कंपनी के दस्तावेज के मुताबिक यह प्रणाली रियल-टाइम में 10 करोड़ लोगों तक के डेटाबेस में चेहरों की तलाश कर सकती है।

यह तकनीक ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट (जीपीयू) पर आधारित है। यही चिप आज अधिकांश एआई प्रणालियों में इस्तेमाल होती है और फेशियल रिकग्निशन को इतना तेज बनाती है कि यह रियल-टाइम में किया जा सके। 2015 में एआई चिप बनाने वाली कंपनी एनवीडिया ने हर्टा को इस क्षेत्र की उभरती हुई प्रमुख कंपनियों  में शामिल किया था। 2019 तक हर्टा का दावा था कि उसके 50 देशों में 200 से अधिक ग्राहक हैं।

हाल के वर्षों में हर्टा जैसी कंपनियों के बाजार का तेजी से विस्तार हुआ है। इस तरह की तकनीक का इस्तेमाल अब अमेरिका के खेल स्टेडियमों, ब्रिटेन की पुलिस और यूरोपीय संघ के कई देशों की पुलिस द्वारा परीक्षण के तौर पर भी किया जा चुका है।

हालांकि, यूरोप में इस तकनीक के इस्तेमाल पर कड़े प्रतिबंध हैं। 2025 से लागू यूरोपीय संघ के एआई अधिनियम (AI Act) के तहत कानून प्रवर्तन के लिए सार्वजनिक स्थानों पर रियल-टाइम रिमोट बायोमेट्रिक पहचान प्रणालियों, खासकर फेशियल रिकग्निशन तकनीक के इस्तेमाल पर लगभग पूरी तरह रोक लगा दी गई है।

इस प्रतिबंध में केवल तीन बारीक अपवाद हैं। पहला, मानव तस्करी, यौन शोषण या अपहरण के पीड़ितों तथा लापता लोगों की तलाश। दूसरा, किसी विशेष और आसन्न आतंकी खतरे को रोकना। तीसरा, आतंकवाद, हत्या और दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराधों के संदिग्धों की पहचान करना। इन मामलों में भी हर बार इस तकनीक के इस्तेमाल से पहले न्यायाधीश की अनुमति लेना और उसका रिकॉर्ड यूरोपीय संघ के डेटाबेस में दर्ज करना अनिवार्य है। दिल्ली-स्थित डिजिटल अधिकारों के वकील और इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के संस्थापक अपार गुप्ता ने कहा, "भारत में ऐसी कोई सुरक्षा व्यवस्था मौजूद नहीं है।"

फेशियल रिकग्निशन तकनीक तभी काम करती है जब उसे नागरिकों या आबादी के किसी हिस्से के बड़े फोटो डेटाबेस से जोड़ा जाए, ताकि चेहरे का मिलान किया जा सके। भारत में अपराध-संबंधी केंद्रीय डेटाबेस केंद्रीय गृह मंत्रालय की देखरेख में होता है। इसके अलावा, भारत निर्वाचन आयोग और भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (आधार) समेत कई राष्ट्रीय संस्थाओं के पास भी देशभर के लोगों के बड़े फोटो-डेटाबेस हैं। भारत के नए डेटा संरक्षण कानून के तहत किसी नागरिक की व्यक्तिगत जानकारी का उसकी स्पष्ट सहमति के बिना इस्तेमाल करना अवैध है, लेकिन सरकार को इससे छूट मिली है। भारत में फेशियल रिकग्निशन प्रणालियां किन-किन डेटाबेसों से जुड़ी हैं, यह अब भी स्पष्ट नहीं है।

हर्टा का यूरोपीय संघ से बाहर के देशों में भी काम करने का लंबा रिकॉर्ड रहा है। इन्वेस्टिगेट यूरोप द्वारा देखी गई 2021 की एक मार्केटिंग प्रस्तुति में कंपनी ने अपनी कई परियोजनाओं का उल्लेख किया है।

हर्टा की तकनीक का इस्तेमाल दुनिया भर के स्टेडियमों, हवाई अड्डों और मुंबई जैसे शहरों की 'सेफ सिटी' परियोजनाओं में किया जा रहा है। ग्राफिक: जोआना पोपाकी/स्पूवियो

इनमें जमैका, थाईलैंड और भारत के मुंबई में 'सेफ सिटी परियोजनाओं' के तहत पूरे शहर की निगरानी करने वाली योजनाएं शामिल हैं। इसके अलावा, कंपनी की सर्विलांस तकनीक का इस्तेमाल कोलंबिया और इंडोनेशिया की पुलिस, बेलारूस और रूस के फुटबॉल स्टेडियमों तथा मेक्सिको, निकारागुआ और नाइजीरिया के हवाई अड्डों पर भी किया गया है। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि ये साझेदारियां आज भी जारी हैं या नहीं।

2019 में जब रोड्रिगेज से पूछा गया कि क्या उनकी कंपनी की तकनीक का दुरुपयोग हो सकता  है, तो उन्होंने कहा था, "यूरोप में हम पूरी तरह सुरक्षित हैं। यहां बहुत स्पष्ट कानून हैं, जो बताते हैं कि इस तकनीक का इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है। डरने की कोई बात नहीं है।" उस समय यूरोपीय संघ में सार्वजनिक स्थानों पर रियल-टाइम फेशियल रिकग्निशन पर प्रतिबंध लागू नहीं हुआ था। एआई अधिनियम के तहत यह प्रतिबंध फरवरी 2025 से प्रभावी हुआ। हालांकि, उन्होंने भारत जैसे अन्य देशों के नागरिकों को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा पर कुछ नहीं कहा, जहां इस तरह के सख्त कानून मौजूद नहीं हैं।

भारत में हर्टा का विस्तार: रेलवे, जेल और मंदिर

भारत में हर्टा का विस्तार पिछले लगभग एक दशक में धीरे-धीरे हुआ है। कंपनी के एक स्थानीय बिज़नेस पार्टनर  के अनुसार, करीब 2014 में हर्टा ने मुंबई की सेफ सिटी परियोजना के लिए चार या पांच कैमरे उपलब्ध कराए थे।

हर्टा के एक पूर्व वरिष्ठ शोधकर्ता ने अपनी पहचान गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि पहले एल्गोरिदम को गैर-श्वेत लोगों के चेहरों की पहचान करने में समस्या होती थी। लेकिन भारत में शुरुआती परियोजनाओं से मिले डेटा ने इन कमजोरियों को दूर करने में अहम भूमिका निभाई। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी।

हर्टा ने इन्वेस्टिगेट यूरोप से कहा कि वह "ग्राहकों की परियोजनाओं से मिलने वाले परिचालन संबंधी डेटा का इस्तेमाल प्राथमिक रूप से अपने एल्गोरिदम को प्रशिक्षित करने या बेहतर बनाने के लिए नहीं करती।" कंपनी ने कहा कि एल्गोरिदम के प्रशिक्षण के लिए किसी भी व्यक्तिगत या बायोमेट्रिक डेटा का इस्तेमाल करने के लिए "स्पष्ट कानूनी आधार होना जरूरी है"।

लेकिन भारत में कंपनी को वास्तविक सफलता आठ साल बाद मिली। 2022 में दिल्ली की एक कंपनी को पूर्वी भारत के सैकड़ों रेलवे स्टेशनों के लिए 123.67 करोड़ रुपए की वीडियो सर्विलांस प्रणाली का ठेका मिला। इस प्रणाली में चेहरे की पहचान करने वाला हिस्सा हर्टा के सॉफ्टवेयर पर चलता है।

पूर्वी रेलवे ने पिछले वर्ष बताया था कि उसके 143 स्टेशनों पर 540 फेशियल रिकग्निशन प्रणालियां चालू हैं। पूरी योजना के तहत 392 स्टेशनों को इस प्रणाली से जोड़ा जाना है, जिनमें क्षेत्र के कई बड़े स्टेशन भी शामिल हैं। हर्टा के स्थानीय साझेदारों का कहना है कि भविष्य में इस प्रणाली को 1,500 से अधिक कैमरों से जोड़ा जा सकता है।

हर्टा ने भारत में अपनी तकनीक के इस्तेमाल की पुष्टि की है। संभव है कंपनी का सॉफ्टवेयर हावड़ा स्टेशन पर भी इस्तेमाल किया जा रहा हो। फोटो: विशेष प्रबंध

अधिकारी कैमरों से मिले चेहरों का नियमित रूप से संदिग्ध व्यक्तियों की एक वॉचलिस्ट से मिलान करते हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि इस सूची में लोगों को किस आधार पर शामिल किया जाता है। हालांकि, हर्टा के एक स्थानीय कारोबारी साझेदार ने दावा किया कि इस वॉचलिस्ट में करीब 10 लाख लोगों के नाम हैं।

उनके अनुसार इस प्रणाली का दायरा यूरोप में उपलब्ध किसी भी ऐसी व्यवस्था से कहीं बड़ा है।

उन्होंने कहा, "सबसे व्यस्त स्टेशन पर अगर सिर्फ एक कैमरा लगाया जाए, तो वह पांच मिनट में 10,000 लोगों के चेहरों की जांच कर सकता है।" उनका दावा है कि यदि किसी व्यक्ति का चेहरा वॉचलिस्ट से मेल खाता है तो उसे रोकने के लिए अधिकार प्राप्त सशस्त्र पुलिस बल को तुरंत अलर्ट भेज दिया जाता है।

2022 में दिल्ली पुलिस ने कहा था कि यदि चेहरों में 80 प्रतिशत समानता मिलती है तो उसे सकारात्मक पहचान माना जाता है। हर दिन लाखों यात्रियों की आवाजाही को देखते हुए छोटी-सी त्रुटि दर भी बड़ी संख्या में गलत पहचान का कारण बन सकती है। खास बात यह है कि वॉचलिस्ट में शामिल लोगों का डेटा सार्वजनिक नहीं है, न ही इसमें नाम शामिल करने के मानदंड बताए गए हैं। साथ ही, यदि किसी व्यक्ति की गलत पहचान हो जाए, तो उसे चुनौती देने की भी कोई व्यवस्था नहीं है।

रेलवे स्टेशनों पर हर्टा की मौजूदगी केवल पूर्वी क्षेत्र तक सीमित नहीं है। रेलवे भूमि विकास प्राधिकरण (आरएलडीए) की स्टेशन आधुनिकीकरण योजना के तहत कंपनी का सॉफ्टवेयर जयपुर और सिकंदराबाद जैसे रेलवे स्टेशनों तक पहुंच चुका है। यह जानकारी हर्टा के स्थानीय साझेदार ने दी।

उक्त साझेदार के अनुसार, हर्टा का सॉफ्टवेयर दिल्ली की तीन प्रमुख जेलों -- तिहाड़, मंडोली और रोहिणी -- में भी फेशियल रिकग्निशन प्रणाली चला रहा है। बताया जाता है कि इस परियोजना का सरकारी ठेका लगभग 35 करोड़ रुपए का है।

यह प्रणाली केवल सरकारी स्थलों तक सीमित नहीं है। उक्त साझेदार का दावा है कि अयोध्या के राम मंदिर में भी यही निगरानी प्रणाली प्रयोग में है। यदि वॉचलिस्ट में शामिल किसी व्यक्ति की पहचान होती है, तो यह स्थानीय पुलिस को तुरंत अलर्ट भेजती है। उन्होंने यह भी कहा कि दो अन्य मंदिरों में इसी तरह की व्यवस्था लगाने का काम जारी है।

हर्टा सेफ सिटी परियोजनाओं के तहत भी काम कर रही है। इन्वेस्टिगेट यूरोप को मिली कंपनी की एक मार्केटिंग प्रस्तुति के अनुसार, अहमदाबाद में कंपनी ने चेहरे की पहचान करने वाले 140 कैमरे लगाए हैं। इसके अलावा कई अन्य शहरों में भी ऐसी परियोजनाओं का उल्लेख किया गया है।

इस मामले पर टिप्पणी के लिए द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने पूर्वी रेलवे, स्मार्ट सिटी अथॉरिटी डेवलपमेंट लिमिटेड और दिल्ली की जेलों के प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों से संपर्क किया, लेकिन किसी ने भी जवाब नहीं दिया।

हर्टा के एक स्थानीय साझेदार के अनुसार, इस समय देशभर में कंपनी का सॉफ्टवेयर लगभग 4,000 कैमरों पर चल रहा है।

निर्भया काण्ड के बाद लिए गए फैसले

भारत में हर्टा के विस्तार का संबंध एक ऐसी सरकारी नीति से जुड़ा माना जाता है जिसकी शुरुआत देश को झकझोर देने वाले निर्भया काण्ड के बाद हुई। दिल्ली में दिसंबर 2012 में एक 23 वर्षीय फिजियोथेरेपी छात्रा अपने एक पुरुष मित्र के साथ फिल्म देखकर लौट रही थी। दोनों एक निजी बस में सवार हुए, लेकिन उन्हें नहीं पता था कि वह यात्री सेवा के लिए नहीं थी। चालक और उसके पांच साथियों ने बहाने से दोनों को बस में बैठाया था।

अगले एक घंटे के दौरान छह लोगों ने छात्रा के मित्र की बेरहमी से पिटाई की और छात्रा के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया और फिर दोनों को गंभीर रूप से घायल अवस्था में बस से बाहर फेंक दिया। छात्रा की दो सप्ताह बाद इलाज के दौरान मौत हो गई। इस घटना के बाद पूरे देश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए और महिलाओं के खिलाफ हिंसा, सार्वजनिक सुरक्षा तथा महिलाओं की रक्षा करने में राज्य की विफलता पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस छिड़ गई।

2013 में केंद्र सरकार ने एक नया कोष बनाने की घोषणा की। उस समय चर्चा में शामिल रहे एक मानवाधिकार वकील ने बताया कि इस मुद्दे पर अभियान चलाने वाले नागरिक संगठनों ने पीड़ितों के लिए सहायता, कानूनी मदद और शेल्टर होम नेटवर्क की मांग की थी।

शुरुआत में इस कोष के लिए 1,000 करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे। इसका उद्देश्य 'महिलाओं और बालिकाओं का सशक्तीकरण, सुरक्षा और संरक्षा' बताया गया। बाद में यह कोष उसी नाम से जाना जाने लगा जो भारतीय मीडिया ने उस छात्रा को दिया था -- निर्भया, जिसका अर्थ है 'निडर'।

दिल्ली में 2012 के सामूहिक बलात्कार कांड के बाद बनाए गए निर्भया फंड का बड़ा हिस्सा सर्विलांस तकनीक पर खर्च किया गया। ग्राफिक: जोआना पोपाकी/स्पूवियो

समय के साथ सरकार ने इस कोष में आवंटन और बढ़ाया। मार्च 2025 तक करीब 5,800 करोड़ रुपए जारी किए जा चुके थे। फरवरी 2024 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस राशि का लगभग 50 प्रतिशत सर्विलांस और पुलिस व्यवस्था पर खर्च हुआ, जबकि केवल 31 प्रतिशत सीधे पीड़ितों की सहायता और आपातकालीन हेल्पलाइन पर खर्च किया गया।

कुछ लोगों का मत है कि इन नई सर्विलांस प्रणालियों से महिलाओं की सुरक्षा में कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार, 2014 में, यानी निर्भया फंड बनने के अगले वर्ष, महिलाओं के खिलाफ 3.4 लाख अपराध दर्ज किए गए थे। इस संबंध में उपलब्ध सबसे ताजा आंकड़े 2023 के हैं, जब अपराधों की संख्या बढ़कर लगभग 4.5 लाख हो गई, यानी करीब एक-तिहाई की वृद्धि हुई।

पिछले 40 वर्षों में महिलाओं के खिलाफ हिंसा के लगभग एक लाख मामलों पर काम करने वाली मुंबई की वरिष्ठ वकील फ्लाविया एग्नेस का कहना है कि देशव्यापी आक्रोश के बाद सरकार की प्रतिक्रिया की रूपरेखा शुरू से ही गलत थी।

उन्होंने कहा, "मेरे सामने ऐसा कोई मामला नहीं आया, जिसमें इस तरह के सर्विलांस से आरोपियों की पहचान करने में मदद मिली हो।" उनके अनुसार, भारत में महिलाओं के खिलाफ अधिकांश हिंसा उन जगहों पर नहीं होती जहां कैमरे लगे हैं, जैसे रेलवे स्टेशन, बल्कि घरों के भीतर होती है। उन्होंने कहा, "करीब 95 प्रतिशत दुष्कर्म के मामलों में आरोपी पीड़िता का परिचित होता है।"

मुंबई में पीड़ितों को कानूनी सहायता देने वाले एक केंद्र का संचालन करने वाली ऑड्रे डी'मेलो का भी कहना है कि उन्हें अपने काम के दौरान इस निगरानी व्यवस्था के प्रभावी होने का कोई प्रमाण नहीं मिला। उनके मुताबिक, महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर तैयार किया गया यह ढांचा वास्तव में बहुत कम मामलों में महिलाओं की सुरक्षा के लिए काम आया है। सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा, "सरकार को यह भी समझ में आ गया कि महिलाओं के नाम पर ऐसी योजनाओं को आगे बढ़ाना ज्यादा आसान है।"

हालांकि, ऐसा कोई प्रत्यक्ष प्रमाण भी उपलब्ध नहीं है जिससे यह साबित हो कि सार्वजनिक स्थानों पर लगाए गए कैमरों से महिलाओं की सुरक्षा में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है।

निर्भया फंड का संचालन करने वाले महिला एवं बाल विकास मंत्रालय से इस संबंध में टिप्पणी मांगी गई, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।

भारत में 2013 के बाद से महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों की संख्या 40 प्रतिशत से अधिक बढ़ी है। ग्राफिक: जोआना पोपाकी/स्पूवियो

यूरोप में प्रतिबंधित, भारत में प्रचलित

यूरोपीयन यूनियन में एआई और बायोमेट्रिक्स कानून के चार विशेषज्ञों का कहना है कि ईस्टर्न रेलवे और अहमदाबाद की सेफ सिटी परियोजना में जिस तरह फेशियल रिकग्निशन तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है, वह यूरोपीय संघ में अवैध माना जाएगा।

बेल्जियम के केयू ल्यूवेन विश्वविद्यालय की कैथरीन जैसेरॉन ने कहा, "मुझे नहीं लगता कि ये दोनों मामले सार्वजनिक स्थानों पर पुलिस द्वारा फेशियल रिकग्निशन तकनीक के वैध इस्तेमाल के अच्छे उदाहरण हैं।"

उन्होंने कहा, "ये दोनों परियोजनाएं इतनी व्यापक हैं कि इन्हें कानून में दिए गए किसी भी अपवाद के दायरे में नहीं रखा जा सकता।" उनका इशारा उन बारीक अपवादों की ओर था जिनमें लापता या असुरक्षित लोगों की तलाश, आसन्न आतंकी खतरे को रोकना या गंभीर अपराधों के संदिग्धों की पहचान करना शामिल है।

उन्होंने कहा कि इन अपवादों के तहत भी यूरोपीय संघ के कानून के अनुसार पहले किसी देश को ऐसा कानून बनाना होगा जिसमें निगरानी, रिपोर्टिंग और न्यायिक नियंत्रण के स्पष्ट प्रावधान हों। स्पेन जहां हर्टा का मुख्यालय है, वहां भी अब तक ऐसा कोई कानून नहीं बनाया गया है। इसलिए कंपनी स्पेन में वैसी प्रणाली कानूनी रूप से नहीं चला सकती, जैसी वह भारत में चला रही है।

भारत का कानूनी ढांचा ऐसी सुरक्षा उपलब्ध नहीं कराता।

देश में अभी तक व्यापक डेटा संरक्षण कानून पूरी तरह लागू नहीं है। जो कानून पारित किया गया है, उसमें पुलिस और प्रवर्तन एजेंसियों को इतनी व्यापक छूट दी गई है कि इस तरह की निगरानी प्रणालियां लगभग बिना किसी प्रभावी नियमन के संचालित हो रही हैं।

इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के अपार गुप्ता ने कहा, "भारत दुनिया के उन प्रमुख देशों में है, जहां फेशियल रिकग्निशन तकनीक को बिना पर्याप्त सुरक्षा उपायों के तेजी से अपनाया गया है। इसलिए इस तकनीक को नियंत्रित करने वाला कानून भारत और दूसरे देशों के बीच सबसे बड़ा अंतर पैदा करता है।"

उनके अनुसार, भारत में फेशियल रिकग्निशन तकनीक से जुड़ी परियोजनाएं "खतरनाक रूप से लोकप्रिय" होती जा रही हैं। रेलवे के सीसीटीवी नेटवर्क और शहरों की सर्विलांस परियोजनाओं के अलावा, इस तकनीक का इस्तेमाल हवाई अड्डों पर डिजीयात्रा के जरिए कॉन्टैक्टलेस यात्रा, सरकारी दफ्तरों और स्कूलों में बायोमेट्रिक उपस्थिति दर्ज करने तथा सरकार द्वारा अनिवार्य फेस-बेस्ड पेंशन जीवन प्रमाणन ऐप में भी व्यापक रूप से किया जा रहा है।

गुप्ता का मानना है कि आने वाले समय में इस तकनीक का इस्तेमाल एक बड़ा सार्वजनिक मुद्दा बनेगा, जब लोग इसे नागरिक स्वतंत्रताओं से जोड़कर देखना शुरू करेंगे और इसके बिना पर्याप्त जांच-पड़ताल के बढ़ते इस्तेमाल पर सवाल उठाएंगे। उन्होंने कहा, "ऐसा अगले करीब दस वर्षों में होगा। इसकी शुरुआत तो कुछ हद तक अभी से हो चुकी है।"

ईयू के फंड से विकसित भीड़-नियंत्रण तकनीक

भारत में जिस तरह की सर्विलांस तकनीक हर्टा बेच रही है, उसे विकसित करने के लिए कंपनी को यूरोपीय संघ से पब्लिक फंड भी मिला है। इन्वेस्टिगेट यूरोप के विश्लेषण के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में हर्टा को यूरोपीय संघ की शोध परियोजनाओं के तहत कम से कम 30 लाख यूरो (2024 की विनिमय दर के अनुसार लगभग 27 करोड़ रुपए) की वित्तीय सहायता मिली।

इसके अलावा, कंपनी को स्पेन सरकार की राष्ट्रीय योजनाओं से भी मदद प्राप्त हुई। सबसे बड़ा अनुदान 2022 से 2024 के बीच FUTURE नामक परियोजना के लिए मिला, जिसकी राशि 23.6 लाख यूरो (लगभग 23 करोड़ रुपए) थी।

हर्टा के अनुसार इस परियोजना के तहत विकसित तकनीक का उद्देश्य 'भीड़ के व्यवहार का विश्लेषण कर बड़ी सभाओं, सार्वजनिक आयोजनों और अत्यधिक भीड़ वाले इलाकों में असामान्य गतिविधियों और संभावित खतरों की पहचान करना' था।

परियोजना की वेबसाइट के एक अलग पेज में बताया गया था कि इसकी फेशियल रिकग्निशन प्रणाली कानून प्रवर्तन एजेंसियों को 'संदिग्धों और आतंकवादियों की तेजी और सटीक पहचान करने' में मदद करने के लिए बनाई गई है। इस पेज को बाद में हटा दिया गया था लेकिन इसका रिकॉर्ड वेब आर्काइव में सुरक्षित है। 

हर्टा ने जिस उपयोग का उल्लेख किया था -- यानी भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थानों पर संदिग्धों की रियल-टाइम पहचान -- FUTURE परियोजना समाप्त होने के कुछ समय बाद उसी तरह के इस्तेमाल पर यूरोपीय संघ ने अपने यहां बड़े पैमाने पर प्रतिबंध लगा दिया। हालांकि, जांच के अनुसार कंपनी भारत में इसी मॉडल को अपनाती हुई दिखती है।

हर्टा के एक प्रवक्ता ने कहा, "कई अन्य प्रौद्योगिकी कंपनियों की तरह, शोध परियोजनाओं से प्राप्त ज्ञान हमारी विशेषज्ञता, कार्यप्रणाली और उत्पाद विकास की दिशा को आगे बढ़ाने में योगदान दे सकता है।"

उन्होंने कहा, "हालांकि, यूरोपीय संघ से मिलने वाली शोध सहायता का इस्तेमाल भारत या किसी अन्य देश में किसी विशेष व्यावसायिक परियोजना के वित्तपोषण, संचालन या सब्सिडी के लिए नहीं किया जाता।"

इस मामले पर टिप्पणी के लिए भेजे गए सवालों का यूरोपीय आयोग ने खबर प्रकाशित होने तक कोई जवाब नहीं दिया।

यूरोपीय संसद में इटली के सदस्य ब्रांडो बेनिफेई ने यूरोपीय संसद की ओर से एआई अधिनियम (AI Act) को अंतिम रूप देने वाली वार्ताओं का नेतृत्व किया था। उनका मानना है कि जब इस तरह की फेशियल रिकग्निशन तकनीक के इस्तेमाल पर यूरोप में बड़े पैमाने पर रोक लगाई जा चुकी है, तो कानून को एक कदम और आगे बढ़ाते हुए ऐसी तकनीकों के यूरोपीय संघ से बाहर निर्यात पर भी प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा, "यदि यूरोपीय संघ अपनी कंपनियों को उन तकनीकों से विदेशों में मुनाफा कमाने की अनुमति देता है, जिन्हें उसने अपने ही नागरिकों के लिए बहुत खतरनाक मानकर प्रतिबंधित किया है, तो वह खुद को डिजिटल अधिकारों का वैश्विक समर्थक नहीं कह सकता। हमें ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए, जिससे जिन प्रणालियों को हम अपने यहां इस्तेमाल की अनुमति नहीं देते, उनका निर्यात और विदेशों में उपयोग भी न हो सके।"

अतिरिक्त रिपोर्टिंग: स्निग्धेंदु भट्टाचार्य और शिवनारायण राजपुरोहित

यह रिपोर्ट इन्वेस्टिगेट यूरोप ने तैयार की है जो वैश्विक खोजी पत्रकारिता करती है। इस जांच के लिए टीम को पुलित्जर सेंटर के एआई अकाउंटेबिलिटी नेटवर्क का सहयोग मिला। यह खोजी रिपोर्ट इन्वेस्टिगेट यूरोप के नेतृत्व में तैयार की गई है और इसे उसके मीडिया साझेदारों -- द रिपोर्टर्स कलेक्टिव (भारत), इन्फोलिब्रे (स्पेन), टेक पॉलिसी प्रेस (अमेरिका), कंप्यूटर वीकली (ब्रिटेन) और ईयू ऑब्जर्वर (बेल्जियम) -- के साथ प्रकाशित किया जा रहा है।

Image by : Olivia Chaddha

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