
नई दिल्ली: भारत सरकार ने जब पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाने के अहम पड़ाव को पार करने का जश्न मनाया, उसके करीब दो महीने बाद केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने दिल्ली में एक कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया।
उन्होंने इस दावे को पूरी तरह से नकार दिया कि इथेनॉल वाले पेट्रोल से चलने वाली गाड़ियाँ ज़्यादा तेल पी रही हैं या उनके इंजन ख़राब हो रहे हैं। हरदीप सिंह पुरी ने ऊर्जा विशेषज्ञों (एनर्जी एक्सपर्ट्स) की सभा के सामने ठीक इन्हीं शब्दों में कहा कि ये बातें "कोरी बकवास" हैं।
उन्होंने कहा, “जैव ईंधन (बायोफ्यूल) से इंजनों को नुकसान पहुँचने की जितनी भी कहानियाँ आप सुनते हैं, वे पूरी तरह से बकवास हैं [अंग्रेज़ी में कहें तो बुलशिट हैं]।”
अपनी बात आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा, "मैं आपको ऐसे 21 कारण बता सकता हूँ जिनकी वजह से कार का माइलेज एक-दो परसेंट गिर सकता है।"
हरदीप सिंह पुरी ने दावा किया कि 20 प्रतिशत इथेनॉल वाले (E20) पेट्रोल की वजह से गाड़ियाँ ज़्यादा तेल नहीं खा रही हैं, बल्कि E20 से ज़्यादा पेट्रोल तो दिल्ली या गुरुग्राम के ट्रैफ़िक और भीड़भाड़ वाली सड़कों पर गाड़ी चलाने से फूँकता है।
केंद्र सरकार के खुद के ही आँकड़ों का इस्तेमाल करते हुए द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने हरदीप सिंह पुरी के दावों की सच्चाई (फैक्ट-चेक) जाँची। मोटर स्पिरिट कंसम्पशन डाटा और गाड़ियों की बढ़ती संख्या के हमारे विश्लेषण से पता चलता है कि जब से पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने के काम में तेज़ी आई है, तब से गाड़ियों का माइलेज कम हो गया है। इसी घटे हुए माइलेज की भरपाई के लिए आम लोगों को पिछले तीन सालों में – 1 अप्रैल 2023 से 31 मार्च 2026 के बीच – करीब 88,234 करोड़ रुपये ज़्यादा खर्च करने पड़े हैं। मोटर स्पिरिट का मतलब गाड़ियों को चलाने के लिए इस्तेमाल होने वाले सभी प्रकार के पेट्रोल और उसमें मिलावट वाले ईंधनों से है।
यह एक ऐसा खर्च है जो भारतीय कंज्यूमर्स को भविष्य में भी हर साल लगातार उठाना पड़ेगा। अगर सरकार पेट्रोल में इथेनॉल का प्रतिशत और बढ़ाती है, तो आम जनता पर यह आर्थिक बोझ और भी बढ़ जाएगा।
माइलेज में आई इस गिरावट की वजह बहुत साधारण सा विज्ञान है। सरकार ने अपनी रिपोर्टों में इस सच को माना भी था, लेकिन बाद में भाषणबाजी और लफ्फाजी के पीछे इसे छिपाने की कोशिश की। सीधी सी बात यह है कि इथेनॉल जलने पर पेट्रोल जितनी ऊर्जा नहीं देता। इथेनॉल की ईंधन क्षमता पेट्रोल के मुकाबले लगभग 33 प्रतिशत कम है।
हालाँकि, पेट्रोल में इथेनॉल मिलाकर सरकार ने अपने कच्चे तेल के आयात (इम्पोर्ट) बिल में कुछ बचत ज़रूर की है। लेकिन इस बदलाव की क़ीमत सीधे तौर पर देश के गाड़ी चलाने वाले कंज्यूमर्स को चुकानी पड़ रही है। इस नुक़सान का जो दायरा है, उसे न तो सरकार ने स्वीकारा है और न ही इसका कोई हिसाब दिया है – उल्टा इसे पूरी तरह से 'बकवास' बताकर ख़ारिज कर दिया।
कंज्यूमर इस अतिरिक्त ख़र्च से बिना इथेनॉल वाले यानी 'ज़ीरो इथेनॉल' पेट्रोल को चुनकर भी नहीं बच सकता। ऐसा इसलिए है क्योंकि अगर आप आज सिर्फ़ शुद्ध पेट्रोल पर शिफ्ट होना चाहते हैं, तो सरकार ने उसकी क़ीमत इथेनॉल वाले पेट्रोल से 66 से 68 रुपये प्रति लीटर ज़्यादा तय कर रखी है (दिल्ली की मौजूदा दरों के हिसाब से)। दिल्ली में जहाँ इथेनॉल मिला पेट्रोल लगभग 102 रुपये प्रति लीटर मिलता है, वहीं ज़ीरो इथेनॉल वाले पेट्रोल की क़ीमत करीब 167 से 170 रुपये प्रति लीटर है।
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इथेनॉल का बड़ा प्रयोग
इथेनॉल एक तरह का अल्कोहल है, जिसे गन्ने और अनाज जैसे कच्चे माल से तैयार किया जाता है। भारत में इसे करीब 23 साल पहले गाड़ियों में इस्तेमाल होने वाले पेट्रोल के विकल्प के तौर पर जैव ईंधन यानी बायो-फ्यूल के रूप में लाया गया था।
जनवरी 2003 में शुरू किए गए सरकार के 'इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम' (इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम) का शुरुआती लक्ष्य नौ राज्यों और चार केंद्र शासित प्रदेशों में सप्लाई होने वाले पेट्रोल में 5 प्रतिशत इथेनॉल मिलाना था। लेकिन 2013-14 तक पेट्रोल में इथेनॉल का मिश्रण बहुत ही मामूली – महज़ 0.1 प्रतिशत से 1.5 प्रतिशत के बीच ही रहा, जो सरकार के शुरुआती लक्ष्य से बहुत नीचे था।
भाजपा के सत्ता में आने के बाद इस कार्यक्रम की रफ़्तार को बड़ा बढ़ावा मिला। अप्रैल 2019 में इथेनॉल मिला पेट्रोल (कुछ अपवादों को छोड़कर) पूरे देश में लागू कर दिया गया। पिछले तीन सालों में पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने का प्रतिशत तेज़ी से बढ़ा और यह पिछले साल जुलाई में बढ़कर 20 प्रतिशत तक पहुँच गया।

पिछले एक साल में भारत में गाड़ी चलाने वालों ने अपने पेट्रोल के खर्च में भारी बढ़ोतरी की शिकायत करनी शुरू कर दी। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उतनी ही दूरी तय करने के लिए उन्हें पहले से ज़्यादा पेट्रोल ख़रीदना पड़ रहा था।
कम्युनिटी प्लेटफॉर्म लोकलसर्किल (LocalCircles) ने शहरी क्षेत्रों के उन 44,000 से ज़्यादा पेट्रोल वाहन मालिकों के बीच एक सर्वे किया, जिनकी गाड़ियाँ 2023 से पहले की थीं। इस सर्वे में यह बात सामने आई कि ज़्यादातर लोगों का मानना है कि 2025 की शुरुआत से E20 ईंधन से गाड़ियाँ चलाने पर माइलेज में 15 से 20 प्रतिशत तक की कमी आई है।
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी का मानना है कि आम वाहन चालक माइलेज में आई इस तरह की गिरावट का सटीक अंदाज़ा नहीं लगा सकते। जबकि सर्वे में शामिल हज़ारों गाड़ी के मालिकों का कहना है कि ज़्यादा इथेनॉल मिले पेट्रोल से गाड़ियों का माइलेज घटा है, और हर बीतते महीने के साथ लोगों की यह शिकायत और भी गहरी होती जा रही है।
भारत फिलहाल अपनी ज़रूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात (ख़रीद) करता है। उम्मीद यह थी कि अन्य फ़ायदों के अलावा, पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने से सरकार का ईंधन आयात बिल कम होगा।
साल 2003 में इसकी शुरुआत से लेकर 2014 तक, इथेनॉल का मिश्रण बहुत ही कम न के बराबर था। जून 2018 में, सरकार ने अपनी 'राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति' (नैशनल पॉलिसी ऑन बायोफ्यूल्स) को अधिसूचित किया और 2030 तक पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाने का लक्ष्य रखा। इसके तीन साल बाद प्रकाशित नीति आयोग की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि E20 (20 प्रतिशत इथेनॉल) मिश्रण का लक्ष्य हासिल होते ही भारत अपने तेल आयात बिल में लगभग 30,000 करोड़ रुपये की बचत करेगा।
जुलाई 2025 में, भारत ने समय से पाँच साल पहले ही 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण का अपना लक्ष्य हासिल कर लिया। वित्त वर्ष 2025-2026 में पेट्रोल में औसतन 19.9 प्रतिशत इथेनॉल मिलाया गया। हमने इसका हिसाब पेट्रोलियम मंत्रालय के 'पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल' (PPAC) द्वारा जारी किए जाने वाले मासिक इथेनॉल ब्लेंडिंग के आंकड़ों का इस्तेमाल करके लगाया है।
इथेनॉल ब्लेंडिंग का रोडमैप तैयार करने वाली नीति आयोग की 2021 की रिपोर्ट में एक बहुत अहम चिंता की बात स्वीकार की गई थी। लेकिन जैसे-जैसे भारत ने पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की रफ़्तार बढ़ाई, केंद्रीय मंत्रियों – हरदीप सिंह पुरी और नितिन गडकरी – ने इस चिंता को मामूली बताकर दबाने की कोशिश की।
गडकरी 2000 के दशक की शुरुआत से ही इथेनॉल ब्लेंडिंग के बड़े समर्थक रहे हैं। उनके मंत्रालय ने इसे लागू करने के लिए गाड़ियों के नियमों और मानकों में बदलाव भी किए। लेकिन फिर भी, यह सब तब तक मुमकिन नहीं था जब तक कि केंद्रीय कैबिनेट की मंज़ूरी से पुरी के पेट्रोलियम मंत्रालय ने इथेनॉल ब्लेंडिंग को 20 प्रतिशत तक पहुँचाने में पूरी मदद न की होती। ये दोनों मंत्री आज भी इथेनॉल ब्लेंडिंग नीति के सबसे बड़े पैरोकार बने हुए हैं।
2021 की रिपोर्ट तैयार करने के लिए नीति आयोग ने कई मंत्रालयों और इंडस्ट्री से जुड़ी संस्थाओं से सलाह ली थी। उन्होंने खुद माना था कि E20 पेट्रोल पर गाड़ियाँ चलाने से माइलेज गिरेगा। यानी लोगों को उतनी ही दूरी तय करने के लिए ज़्यादा तेल ख़र्च करना पड़ेगा।
रिपोर्ट में कहा गया था, “जब E20 ईंधन का इस्तेमाल किया जाता है, तो मूल रूप से E0 के लिए बने और E10 के हिसाब से सेट (कैलिब्रेटेड) 4-पहिया वाहनों (चार पहिया गाड़ियों) के माइलेज में 6-7% की कमी आने का अनुमान है। वहीं E0 के लिए बने और E10 के हिसाब से सेट 2-पहिया वाहनों के माइलेज में 3-4% और E10 के लिए बने व E20 के हिसाब से सेट 4-पहिया वाहनों के माइलेज में 1-2% की गिरावट आती है।”

इस खतरे की चेतावनी के बावजूद सरकार आगे बढ़ती रही। कम माइलेज से कंज्यूमर्स पर पड़ने वाले अतिरिक्त बोझ की भरपाई के लिए सरकार चाहती तो गाड़ियों के लिए E20 ईंधन की कीमतें घटा सकती थी। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।
जब सरकार द्वारा महज तीन वर्षों के भीतर इथेनॉल ब्लेंडिंग को तेज़ी से 10 से बढ़ाकर 20 प्रतिशत किए जाने के बाद कंज्यूमर्स की शिकायतें बढ़ीं, तो केंद्रीय मंत्री गडकरी ने माइलेज में आई इस गिरावट को मामूली बताकर तुरंत ख़ारिज कर दिया।
जुलाई 2026 में 'टाइम्स ऑफ इंडिया' को दिए एक इंटरव्यू में गडकरी ने अपनी बात बरकरार रखते हुए कहा कि पेट्रोल की तुलना में इथेनॉल का कैलोरी मान (कैलोरिफिक वैल्यू) कम होने के कारण E20 पेट्रोल से माइलेज में होने वाला नुकसान मामूली ही होगा। गडकरी ने कहा, "दिल्ली या मुंबई के शहर के ट्रैफ़िक में आपको कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखेगा। हाँ, जब आप दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर तेज़ रफ़्तार से गाड़ी चला रहे होंगे, तब माइलेज में थोड़ा बहुत नुकसान हो सकता है।"
उसी महीने, 20 जुलाई को केंद्रीय मंत्री पुरी ने दावा किया कि "बड़े पैमाने पर की गई लैब टेस्टिंग और फ़ील्ड ट्रायल्स" से यह साबित हुआ है कि E20 पेट्रोल से गाड़ियों की परफ़ॉर्मेंस पर कोई बड़ा फ़र्क़ नहीं पड़ता और न ही गाड़ियों के पार्ट्स (पुर्ज़ों) में कोई ख़ास घिसावट या खराबी आती है। उन्होंने यह बात राज्यसभा में सांसद जॉन ब्रिटास के एक सवाल के जवाब में कही थी।
लेकिन केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय ने इन तथाकथित स्टडीज़ और ट्रायल्स की सरकारी रिपोर्टों को पब्लिक के सामने नहीं रखा।
हमने अपने सवालों की लिस्ट भेजकर मंत्रालय से इन ट्रायल्स की रिपोर्ट देने की गुज़ारिश की थी, लेकिन इस ख़बर के छपने तक उनकी तरफ़ से कोई जवाब नहीं आया।
द कलेक्टिव ने इस बात का विश्लेषण करने का फैसला किया कि जब से सरकार ने इथेनॉल ब्लेंडिंग को तेज़ी से बढ़ाया है, तब के बाद के समय में पिछले तीन वित्तीय वर्षों में कंज्यूमर्स को पेट्रोल के रूप में कितना अतिरिक्त बिल (खर्च) चुकाना पड़ा है।
नागरिकों पर E20 का आर्थिक बोझ
चूँकि सरकार ने E20 ब्लेंडिंग ईंधन से चलने वाले वाहनों के ईंधन की क्षमता यानि माइलेज में होने वाले नुकसान पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया, इसलिए द कलेक्टिव ने इथेनॉल और शुद्ध पेट्रोल के बीच कैलोरी मान (कैलोरिफिक वैल्यू) के एक साधारण बदलाव का इस्तेमाल किया। इसी आधार पर E20 पेट्रोल से चलने वाली कारों और दोपहिया वाहनों के माइलेज में होने वाले नुकसान की गणना की गई।
एक लीटर इथेनॉल को जलाने से एक लीटर शुद्ध पेट्रोल के मुकाबले 33 प्रतिशत कम ऊर्जा मिलती है। इस हिसाब से जब पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाया जाता है, तो हमारी कैलकुलेशन के अनुसार, यह शुद्ध पेट्रोल की तुलना में 6.7 प्रतिशत कम ऊर्जा देता है। ऑटोमोबाइल उद्योग के एक विशेषज्ञ, जिन्होंने इथेनॉल ब्लेंडिंग पर काम किया है, उन्होंने भी इस कैलकुलेशन अपनी मुहर लगाई है।
इसी आधार पर हमने अप्रैल 2023 के बाद के सभी वित्तीय वर्षों के लिए पेट्रोल की अनुमानित खपत का हिसाब लगाया। अप्रैल 2023 हमारे इस विश्लेषण का शुरुआती बिंदु था, जब से इथेनॉल ब्लेंडिंग को E10 से बढ़ाकर E20 किया गया था।
वित्त वर्ष 2025-26 में, भारत में 42.6 मिलियन मेट्रिक टन पेट्रोल की खपत हुई, जिसमें लगभग 20 प्रतिशत इथेनॉल मिला हुआ था। अगर यह सिर्फ़ शुद्ध पेट्रोल होता, तो भारतीयों को केवल 39.76 मिलियन मेट्रिक टन की ही ज़रूरत पड़ती। इस तरह वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने 2.83 मिलियन मेट्रिक टन (2.83 MMT) अतिरिक्त ईंधन जलाया।
पिछले तीन वित्तीय वर्षों में भारत ने इथेनॉल ब्लेंडिंग को धीरे-धीरे 11.8 प्रतिशत से बढ़ाकर 20 प्रतिशत कर दिया। चूँकि इथेनॉल, शुद्ध पेट्रोल के मुकाबले लगभग 33 प्रतिशत कम ऊर्जा देता है, इसलिए ब्लेंडिंग का यह प्रतिशत बढ़ने के कारण भारत में वाहन चालकों को शुद्ध पेट्रोल के मुकाबले 65.7 लाख मेट्रिक टन (6.57 MMT) अतिरिक्त ईंधन जलाना पड़ा। इन तीन सालों के दौरान, इस अतिरिक्त ईंधन की कुल अनुमानित क़ीमत 88,234 करोड़ रुपये बैठती है।
पेट्रोलियम मंत्रालय और परिवहन मंत्रालय को सवाल भेजे गए थे। लेकिन इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने तक दोनों मंत्रालयों की तरफ़ से कोई जवाब नहीं आया था।
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अतिरिक्त ख़र्च हुए ईंधन की लागत का हिसाब लगाने के लिए हमने माना कि लोगों को बिना मिलावट वाला (शुद्ध) पेट्रोल बहुत ज़्यादा दामों में ख़रीदने के लिए मजबूर न होना पड़े, बल्कि उन्हें वही पेट्रोल उस समय दिल्ली में तय की गई इथेनॉल वाले पेट्रोल की क़ीमत पर ही मिल जाए। हमने हिसाब-किताब का यह कम से कम नुकसान दिखाने वाला तरीक़ा इसलिए चुना, क्योंकि अगर शुद्ध पेट्रोल के मौजूदा महँगे दामों के हिसाब से देखा जाए, तो मोटर चलाने वालों का पेट्रोल बिल इससे कहीं ज़्यादा आसमान छूने लगता।
भारत में, पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने के बाद भी इसकी कीमत में कोई बदलाव नहीं हुआ है और यह पहले जितनी ही बनी हुई है। इसके विपरीत अमेरिका में, जो दुनिया में इथेनॉल का सबसे बड़ा उत्पादक है, बिना मिलावट वाले पेट्रोल की तुलना में इथेनॉल ब्लेंडेड ईंधन पर सब्सिडी दी जाती है। वह सस्ता मिलता है।
इसी आधार पर, इस अतिरिक्त ईंधन की खपत के लिए केवल वित्त वर्ष 2025-26 में ही भारतीयों को 37,843 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बिल चुकाने के लिए मजबूर होना पड़ा, जो कि तीन वित्तीय वर्षों में कुल मिलाकर 88,234 करोड़ रुपये बैठता है।
हमने पेट्रोल की खपत में आई बढ़ोतरी की तुलना सड़कों पर दौड़ने वाले वाहनों की कुल सालाना संख्या में हुई बढ़ोतरी से भी की। हालाँकि, सरकार यह डेटा (आंकड़े) उपलब्ध नहीं कराती है। इसके लिए हमने नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक 'काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर' (CEEW) द्वारा किए गए एक अध्ययन का सहारा लिया, ताकि हर साल सड़कों पर सक्रिय वाहनों की संख्या का अनुमान लगाया जा सके।
CEEW गाड़ी के मालिकों के आंकड़ों के साथ-साथ जीडीपी और जनसंख्या के अनुमानों का इस्तेमाल करके यह पता लगाता है कि वर्ष 2023 में सड़कों पर कुल कितनी गाड़ियाँ चल रही थी। इस अध्ययन को आधार बनाते हुए, हमने अलग-अलग वित्तीय वर्षों में वाहनों की शुद्ध संख्या में हुई बढ़ोतरी का अनुमान लगाया और इसकी तुलना ब्लेंडेड पेट्रोल की खपत में हुई बढ़ोतरी से की।
इस अनुमान से एक रुझान सामने आया। जिन वर्षों में देश भर में इथेनॉल ब्लेंडिंग को बढ़ाया गया और केंद्र सरकार ने 20 प्रतिशत इथेनॉल ब्लेंडिंग के लिए ज़ोर दिया, उन सालों में सड़कों पर गाड़ियों की संख्या के मुकाबले पेट्रोल की खपत कहीं ज़्यादा तेज़ी से बढ़ी। इसका मतलब यह है कि हर बीतते साल के साथ गाड़ियाँ ज़्यादा से ज़्यादा ईंधन इस्तेमाल कर रही थीं, जो इथेनॉल के कारण माइलेज में होने वाले नुकसान (माइलेज पेनल्टी) की ओर इशारा करता है।
जहां इथेनॉल ब्लेंडिंग ने गाड़ियों में ईंधन की खपत को बढ़ाया, लेकिन इसके अलावा सड़कों के नेटवर्क का विस्तार (जिससे गाड़ियाँ ज़्यादा लंबी दूरी तय करने लगीं) और शहरों में बढ़ती ट्रैफ़िक जाम जैसी समस्याओं ने भी ईंधन की खपत बढ़ाने में भूमिका निभाई होगी।
इस विश्लेषण से एक बात बिल्कुल साफ़ है कि पिछले छह सालों में पेट्रोल में इथेनॉल का औसतन मिश्रण लगभग 5 प्रतिशत से बढ़कर 20 प्रतिशत हो गया है, और ईंधन की खपत हमेशा गाड़ियों की संख्या की तुलना में ज़्यादा तेज़ी से बढ़ी है।
इसके मुकाबले, अगर भारतीयों को बिना मिलावट वाला (शुद्ध) पेट्रोल मिलता, तो ईंधन की यह बढ़ती खपत कम हो सकती थी। इसके बजाय, लोगों को पिछले तीन सालों में अंदाज़न 88,234 करोड़ रुपये अतिरिक्त चुकाने पड़े।
माइलेज में नुकसान का यह वही ख़र्च है जिसे मंत्री हरदीप सिंह पुरी और नितिन गडकरी 'मामूली' या 'बकवास' मानकर ख़ारिज कर देते हैं। भले ही भारत में गाड़ी चलाने वाले सरकार के इथेनॉल-संचालित सपने की राह पर चलने के लिए अपनी जेब से हज़ारों करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च कर रहे हों।
पब्लिक में मौजूद सीमित डेटा के आधार पर हमने अपने हिसाब-किताब में बेहद संभलकर चलने वाला (सुरक्षित) तरीक़ा ही अपनाया है। बस एक ही ऐसी चीज़ है जो चालकों के पेट्रोल बिल पर थोड़ा कम असर दिखा सकती है, और वह है – हर साल लोगों का गाड़ियों से सड़कों पर ज़्यादा दूरी तय करना। कुछ स्टडीज़ बताती हैं कि सभी गाड़ियों के लिए यह बढ़ोतरी हर साल करीब तीन प्रतिशत है। लेकिन आम लोगों पर पड़ने वाले इस ख़र्च का सही हिसाब लगाने के लिए जिस डेटा की ज़रूरत है, सरकार उसे पब्लिक ही नहीं करती।
एक और बात जिसे मंत्री पुरी ने काफ़ी बढ़ा-चढ़ाकर बताया, वह है सड़कों पर गाड़ियाँ बढ़ने की वजह से ट्रैफ़िक का धीमा होना। यह सच है कि ट्रैफ़िक में फँसने से माइलेज कम होता है, लेकिन कितना? E20 की वजह से हुए नुक़सान के सामने तो यह बहुत ही मामूली है। इसके सही आँकड़े शायद सरकारी फ़ाइलों में ही बंद पड़े हैं, जबकि मंत्री बाहर आकर अपनी-अपनी सफ़ाई दे रहे हैं।
अभी हाल ही में ख़बर आई है कि गडकरी को गूगल और मेटा जैसी सोशल मीडिया कंपनियों पर केस करने की इजाज़त मिल गई है, ताकि इथेनॉल ब्लेंडिंग के ख़िलाफ़ “मानहानि” कंटेंट पोस्ट करने वाले पेजों और संस्थाओं को हटवाया जा सके।
अनुवाद: अजय कुमार — पूर्व पत्रकार (द वायर, न्यूज़क्लिक), वर्तमान में स्वतंत्र पत्रकारिता में सक्रिय।

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